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खण्डकाव्य

खण्डकाव्य प्रबंध काव्य का एक लघु रूप है। यह महाकाव्य से छोटा रूप है।

विश्वनाथ कविराज की परिभाषा के अनुसार किसी भाषा या उपभाषा में सर्गबद्ध एवं एक कथा का निरूपक पद्यग्रन्थ जिसमें सभी संधियां न हों, काव्य कहलाता है और काव्य के एक अंश का अनुसरण करनेवाला खण्डकाव्य होता है।

परन्तु विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा कि महाकाव्य के ही ढंग पर जिस काव्य की रचना होती है, पर जिसमें पूर्ण जीवन न ग्रहण करके खण्ड जीवन ही ग्रहण किया जाता है उसे खण्डकाव्य कहते हैं। यह खण्ड जीवन इस प्रकार व्यक्त किया जाता है जिससे वह प्रस्तुत रचना के रूप में स्वतः पूर्ण प्रतीत होता है।

खण्डकाव्य का विस्तार स्वाभाविक रूप से महाकाव्य से कम होता है। प्रायः आठ से कम सर्गों वाले काव्य को खण्डकाव्य मान लिया जाता है जबकि उससे अधिक सर्गों वाले को महाकाव्य कहा जाता है। परन्तु तत्वतः विवेचन करने से यह गलत साबित हो जाता है। महाकाव्यों के गुण, जैसे गरिमा तथा उदात्त शैली आदि न हों तो उसे महाकाव्य कहा ही नहीं जा सकता चाहे उसके सर्गों की संख्या कितनी भी क्यों न हो। यही मानदंड खण्डकाव्य पर भी लागू होता है। जीवन के किसी भी खण्ड को गरिमामय ढंग से चित्रित करने पर ही वह खण्डकाव्य कहा जायेगा चाहे उसमें सर्गों की संख्या जितनी भी क्यों न हो।


Page last modified on Wednesday August 27, 2014 18:23:21 GMT-0000