विभिन्न पुराणों में गणेशजी के जन्म के संबंध में अलग-अलग कथाएं कही गई हैं। गणेशजी भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती के प्राणप्रिय पुत्र हैं। गणेशजी बुद्धि के अधिष्ठाता हैं और शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। गणेशजी का वाहन मूषक है।
गणेशजी अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी हर कार्य से पहले पूजा अनिवार्य मानी गई है। गणेशजी का प्रिय आहार मोदक यानि लड्डू है। गणेशजी को गणपति बप्पा, गजानन, विघ्ननाशक आदि कई नामों से पुकारा जाता है।
लिंगपुराण में दी हुई कथा में कहा गया है कि एक बार देवतागण दानवों से काफी त्रस्त हो गए थे क्योंकि दैत्य ब्रह्मा जी की आराधना कर मनचाहे वर मांग लेते थे और समूची दुनिया को परेशान करते थे। इससे त्रस्त होकर एक दिन सभी देवतागण भगवान शिवजी के पास गए और उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया। भगवान शिव ने देवताओं को आश्वस्त किया कि तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी। इस वार्ता के कुछ समय बाद माता पार्वती के समक्ष एक देव पुरुष प्रकट हुआ। उनका मुख हाथी का था और उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में पाश था।
भगवान शिव ने उस पुरुष को सम्बोधित करत हुए कहा- ‘‘हे गणेश, तुम्हारा अवतार दुष्टों का सर्वनाश करने के लिए हुआ है। विघ्नहर्ता होने के कारण तुम तीनों लोकों में पूजा योग्य हो। शिवजी ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और मेरी पूजा करने से पहले सबको तुम्हारा पूजन करना होगा। तुम्हारी पूजा किए बगैर किसी की मनोकामना पूरी नहीं होगी। इस प्रसंग के बाद गणपति ने देवताओं का कष्ट दूर किया और दैत्यों के कार्यों में बाधा पहुंचाई।
इसी प्रकार शिवपुराण में भी गणेशजी के बारे में एक कथा दी गई है, जिसके अनुसार एक दिन पार्वतीजी स्नानगृह में थीं तभी भगवान शिव वहां आए तो नंदी ने उन्हें अंदर जाने से रोका लेकिन शिवजी ने नंदी की अवहेलना की और अंदर चले गए। इस पर पार्वतीजी ने सोचा कि मेरे पास एक ऐसा गण होना चाहिए जो पूरी तरह मेरे ही अधिकार में हो। इस प्रकार उन्होंने देह के मैल या उबटन से एक आकार बनाया तो वह सजीव हो उठा। जब आकार सजीव हो उठा तो पार्वतीजी ने उससे कहा कि आज से तुम मेरे पुत्र हो और अब तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ चाहे कोई भी आए तुम मुझसे पूछे बगैर उसे अंदर नहीं आने देना।
कुछ समय के बाद भगवान शिवजी वहां आए। जब उन्होंने अंदर जाना चाहा तो गणेशजी ने उन्हें रोक दिया। शिवजी ने अंदर जाने देने के लिए बहुत कहा लेकिन गणेशजी नहीं माने। इस पर शिवजी क्रोधित हो गए और उन्होंने त्रिशूल से वार किया तो गणेशजी का मस्तक कटकर गिर पड़ा। यह सब देखकर माता पार्वती शिवजी से रुष्ट हो गईं और कहा कि यह मेरा पुत्र था। पार्वतीजी ने शिवजी से अपने पुत्र को जीवित करने के लिए कहा।
इस पर शिवजी मस्तक लाने के लिए काफी जगह घूमे, अंत में वह एक हाथी का मस्तक काट कर ले आए और उसे गणेशजी के धड़ के साथ जड़ दिया तो गणेशजी फिर से जीवित हो उठे। जब गणेशजी जीवित हो उठे तब शिवजी ने कहा कि अनजाने में मुझसे यह सब हो गया था, उन्होंने उसे पुत्र स्वीकारते हुए कहा कि आज के बाद हमारी पूजा से पहले तुम्हारी पूजा अनिवार्य होगी। इसके बाद से ही हर कार्य से पहले गणेशजी का पूजन किया जाने लगा।
गणेशजी के भी विभिन्न अवतार हैं जिनमें उन्होंने सृष्टि से असुरों का नाश किया। इन अवतारों में प्रमुख है महोत्कट विनायक। इस अवतार में उन्होंने दो भाइयों देवातक और नरातक का संहार किया था जोकि प्रभु का वरदान पाकर घमंडी और निरंकुश हो गए थे। इन दोनों भाइयों के वध के लिए गणेशजी ने कश्यप की पत्नी के गर्भ से जन्म लिया। मयूरेश्वर के रूप में भी गणेशजी ने सिंधु दैत्य का संहार किया था जिसे सूर्यदेव ने वरदान दिया था और साथ में अमृतपात्र भी दिया था।
वक्रतुंड के रूप में गणेशजी ने मत्सर दैत्य का वध किया था। एकदंत के रूप में उन्होंने मदासुर को मारा था और महोदर के रूप में मोहासुर का संहार किया था। लम्बोदर गणेश ने क्रोधासुर को मारा था और जब कामासुर आतंक फैलाने लगा था तो गणेशजी ने उसे माफी मांगने पर विवश कर दिया था। इसी प्रकार विघ्नराज बनकर उन्होंने ममासुर का हरण किया और धूम्रवर्ण गणेशजी ने अह्म का घमंड तोड़कर उसे अपना अनुचर बनाया।
आज विश्व भर में गणेशजी का पूजन श्रद्धाभाव से किया जाता है। भारत देश के महाराष्ट्र में तो गणपति उत्सव बड़े जोरशोर से मनाया जाता है। देश भर में किसी भी कार्य का शुभारम्भ करने से पूर्व गणेशजी का ही पूजन किया जाता है। गणेशजी को प्रसन्न करके मनवांछित फल मिलता है।
गणेशजी अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी हर कार्य से पहले पूजा अनिवार्य मानी गई है। गणेशजी का प्रिय आहार मोदक यानि लड्डू है। गणेशजी को गणपति बप्पा, गजानन, विघ्ननाशक आदि कई नामों से पुकारा जाता है।
लिंगपुराण में दी हुई कथा में कहा गया है कि एक बार देवतागण दानवों से काफी त्रस्त हो गए थे क्योंकि दैत्य ब्रह्मा जी की आराधना कर मनचाहे वर मांग लेते थे और समूची दुनिया को परेशान करते थे। इससे त्रस्त होकर एक दिन सभी देवतागण भगवान शिवजी के पास गए और उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया। भगवान शिव ने देवताओं को आश्वस्त किया कि तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी। इस वार्ता के कुछ समय बाद माता पार्वती के समक्ष एक देव पुरुष प्रकट हुआ। उनका मुख हाथी का था और उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में पाश था।
भगवान शिव ने उस पुरुष को सम्बोधित करत हुए कहा- ‘‘हे गणेश, तुम्हारा अवतार दुष्टों का सर्वनाश करने के लिए हुआ है। विघ्नहर्ता होने के कारण तुम तीनों लोकों में पूजा योग्य हो। शिवजी ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और मेरी पूजा करने से पहले सबको तुम्हारा पूजन करना होगा। तुम्हारी पूजा किए बगैर किसी की मनोकामना पूरी नहीं होगी। इस प्रसंग के बाद गणपति ने देवताओं का कष्ट दूर किया और दैत्यों के कार्यों में बाधा पहुंचाई।
इसी प्रकार शिवपुराण में भी गणेशजी के बारे में एक कथा दी गई है, जिसके अनुसार एक दिन पार्वतीजी स्नानगृह में थीं तभी भगवान शिव वहां आए तो नंदी ने उन्हें अंदर जाने से रोका लेकिन शिवजी ने नंदी की अवहेलना की और अंदर चले गए। इस पर पार्वतीजी ने सोचा कि मेरे पास एक ऐसा गण होना चाहिए जो पूरी तरह मेरे ही अधिकार में हो। इस प्रकार उन्होंने देह के मैल या उबटन से एक आकार बनाया तो वह सजीव हो उठा। जब आकार सजीव हो उठा तो पार्वतीजी ने उससे कहा कि आज से तुम मेरे पुत्र हो और अब तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ चाहे कोई भी आए तुम मुझसे पूछे बगैर उसे अंदर नहीं आने देना।
कुछ समय के बाद भगवान शिवजी वहां आए। जब उन्होंने अंदर जाना चाहा तो गणेशजी ने उन्हें रोक दिया। शिवजी ने अंदर जाने देने के लिए बहुत कहा लेकिन गणेशजी नहीं माने। इस पर शिवजी क्रोधित हो गए और उन्होंने त्रिशूल से वार किया तो गणेशजी का मस्तक कटकर गिर पड़ा। यह सब देखकर माता पार्वती शिवजी से रुष्ट हो गईं और कहा कि यह मेरा पुत्र था। पार्वतीजी ने शिवजी से अपने पुत्र को जीवित करने के लिए कहा।
इस पर शिवजी मस्तक लाने के लिए काफी जगह घूमे, अंत में वह एक हाथी का मस्तक काट कर ले आए और उसे गणेशजी के धड़ के साथ जड़ दिया तो गणेशजी फिर से जीवित हो उठे। जब गणेशजी जीवित हो उठे तब शिवजी ने कहा कि अनजाने में मुझसे यह सब हो गया था, उन्होंने उसे पुत्र स्वीकारते हुए कहा कि आज के बाद हमारी पूजा से पहले तुम्हारी पूजा अनिवार्य होगी। इसके बाद से ही हर कार्य से पहले गणेशजी का पूजन किया जाने लगा।
गणेशजी के भी विभिन्न अवतार हैं जिनमें उन्होंने सृष्टि से असुरों का नाश किया। इन अवतारों में प्रमुख है महोत्कट विनायक। इस अवतार में उन्होंने दो भाइयों देवातक और नरातक का संहार किया था जोकि प्रभु का वरदान पाकर घमंडी और निरंकुश हो गए थे। इन दोनों भाइयों के वध के लिए गणेशजी ने कश्यप की पत्नी के गर्भ से जन्म लिया। मयूरेश्वर के रूप में भी गणेशजी ने सिंधु दैत्य का संहार किया था जिसे सूर्यदेव ने वरदान दिया था और साथ में अमृतपात्र भी दिया था।
वक्रतुंड के रूप में गणेशजी ने मत्सर दैत्य का वध किया था। एकदंत के रूप में उन्होंने मदासुर को मारा था और महोदर के रूप में मोहासुर का संहार किया था। लम्बोदर गणेश ने क्रोधासुर को मारा था और जब कामासुर आतंक फैलाने लगा था तो गणेशजी ने उसे माफी मांगने पर विवश कर दिया था। इसी प्रकार विघ्नराज बनकर उन्होंने ममासुर का हरण किया और धूम्रवर्ण गणेशजी ने अह्म का घमंड तोड़कर उसे अपना अनुचर बनाया।
आज विश्व भर में गणेशजी का पूजन श्रद्धाभाव से किया जाता है। भारत देश के महाराष्ट्र में तो गणपति उत्सव बड़े जोरशोर से मनाया जाता है। देश भर में किसी भी कार्य का शुभारम्भ करने से पूर्व गणेशजी का ही पूजन किया जाता है। गणेशजी को प्रसन्न करके मनवांछित फल मिलता है।