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गर्व

गर्व को भारतीय चिंतकों ने संचारी भाव माना है जबकि मनोवैज्ञानिक इसे स्थायी भाव मानते हैं।

साहित्य में यह वह संचारी भाव है जिसमें व्यक्ति के मन में स्वाभिमान होता है और उसे वह किसी दूसरे के समक्ष प्रकट भी करता है। स्वयं के उत्कर्ष या स्वयं को ऊंचा दिखाने की भावना से इसका सृजन होता है जिससे चाह-अनचाहे दूसरों की अवज्ञा हो जाती है। जान-बूझकर की गयी अवज्ञा इसे अभिमान या घमंड की श्रेणी में ला खड़ा करता है।

इस भाव के विभाव या अनुभाव हैं - वैभव, उच्च कुल, सुन्दर रूप, युवावस्था, विद्या-प्रवीणता, बल और धन।

इन अनुभावों के कारण जो विकृतियां प्रकट होती हैं वे हैं - दूसरों का अनादर, अविनय, प्रश्न पूछने पर उत्तर न देना, बात न करना, उपेक्षावृत्ति, उपहास, कठोर वचन कहना, पूज्यों का अनादर करना, अकारण उपालम्भ करना आदि।

मनोविज्ञान में गर्व को एक प्रकार का मनोविकार माना गया है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि गर्व की भावना में डूबा व्यक्ति आत्मविभोर होकर दूसरों के समक्ष उसे प्रकट करता है और ऐसा करते हुए वह सुख का अनुभव करता है जबकि दूसरा दुखी होता है।


Page last modified on Saturday February 21, 2015 17:08:55 GMT-0000