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गीता

गीता का सामान्य अर्थ है वह विशेष काव्य जिसे गाया जाता है, जो ब्रह्मपद प्राप्त करने के लिए साक्षात् धर्म स्वरूप होता है। महाभारत के आश्वमेधिकपर्व में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमदभग्वदगीता, जिसे सामान्य जन गीता के नाम जानते हैं, के बारे में कहा था - स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने। अर्थात् वह धर्म ब्रह्मपद की प्राप्ति के लिए पर्याप्त था, और ' परं हि तु कथितं योगयुक्तेन तन्मया' (उसे मेरे द्वारा योगयुक्त होकर कहा गया था)। भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात अर्जुन से उत्तरगीता में कही थी।

इस प्रकार अनेक ऐसे विशेष काव्यों को गीता के रूप में जाना गया जिन्हें ब्रह्मपद पाने के लिए पर्याप्त माना गया। इन गाये जाने वाले गीता की पुस्तकों की संख्या एक सौ से भी अधिक है परन्तु श्रीमद्भगवदगीता ही सर्वाधिक लोकप्रिय गीता है। इतनी अधिक संख्या में गीता की रचना का मूल कारण यह है कि सभी प्रकार की रुचियों, आवश्यकताओं, मनःस्थितों और परिस्थितियों वाले लोग इस गीता ज्ञान का लाभ उठाकर परमात्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करते हुए ब्रह्मपद को प्राप्त करें।

स्वयं महाभारत में श्रीमद्भगवदगीता के अतिरिक्त षड्जगीता, पिंगलागीता, शम्पाकगीता, मंङ्किगीता, आजगरगीता, हारीतगीता, वृत्रगीता, पुत्रगीता, कामगीता, हंसगीता, नारदगीता, तथा उत्तरगीता उपलब्ध है।

एक हंसगीता श्रीमद्भागवतमहापुराण में भी उपलब्ध है। इसी महापुराण में भिक्षुगीता, परमहंसगीता, तथा अवधूतगीता प्रसिद्ध हैं।

गणेशपुराण में एक गणेशगीता उपलब्ध है।

विष्णुमहापुराण में उपलब्ध यमगीता काफी लोकप्रिय है। वैसे यमगीता के नाम से अग्निमहापुराण में भी एक गीता उपलब्ध है।

अध्यात्मरामायण में एक रामगीता उपलब्ध है। परन्तु एक रामगीता अद्भुतरामायण में भी मिलता है।
देवीपुराण में एक भगवतीगीता उपलब्ध है जिसे पार्वतीगीता के रूप में भी जान जाता है।

अष्टावक्रगीता के नाम पर लोकप्रिय एक ग्रंथ की रचना अष्टावक्र मुनि ने की थी जो उपलब्ध है।

दत्तात्रेय की अवधूतगीता भी एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उनकी जीवनमुक्तगीता भी अत्यन्त महत्वपूर्ण गीता के रूप में सर्वमान्य है।

Page last modified on Tuesday December 24, 2013 16:38:12 GMT-0000