गीति-नाट्य
गीतात्मक भाषा वाले संगीतपूर्ण नाटकों को गीति-नाट्य कहा जाता है। इसमें सम्पूर्ण नाटक गीतों के माध्यम से ही प्रस्तुत की जाती है। गीति-नाट्य प्राचीन काल से ही प्रचलित रहे हैं। प्रचीन यूनान में ऐसे नाटक लिखे और मंचित किये जाने के उदाहरण मिलते हैं।गीति-नाट्यों के पांच अंग हैं - प्रस्तावना, कथा, संवादाभिनय, गीत तथा नर्तन।
गीति-नाट्य की दो शैलियां हैं - मूक अभिनयात्मक तथा संवादात्मक।
मूक अभिनयात्मक शैली में पात्र मूक अभिनय करते हैं जबकि सहयोगी दल नेपथ्य या मंच पर से ही गीतों के माध्यम से घटना या भाव के पद गाते रहते हैं। पात्रों का अभिनय गीतों के अनुरूप ही होता है।
संवादात्मक शैली में पात्र गीतों में ही संवाद करते हुए अभिनय करते हैं। परन्तु कथा को आगे बढ़ाने आदि के मामले में गायक दल या कोई अन्य गीतों के माध्यम का सहारा लेते हैं।