गेय काव्य
गेय काव्य का सामान्य अर्थ है वह काव्य जिसे गाया जा सके। गेय काव्यों की विशेषता यह है कि उनमें कवित्त तथा गेयता दोनों को समान रूप से प्राथमिकता दी जाती है।सामवेद संहिता के दो भागों में से एक को गेय काव्य कहा गया है, दूसरा भाग है आर्चिक।
सामवेद के गेय भाग को यज्ञ के समय गाया जाता है। इस समय प्रधान वैदिक देवताओं से सम्बद्ध गान उद्गाता गाते हैं।
संगीत की उत्पत्ति इसी गेय काव्य से मानी गयी है। इसमें अर्थ तथा संगीत दोनों तत्वों को अक्षुण्ण रखा जाता है।
बाद में गेय काव्य का विकास होता चला गया और कवियों ने प्रचुर मात्रा में गेय पदों की रचना की। हिन्दी के भक्ति काल में कबीर, सूर, तुलसी आदि संत कवियों ने उत्कृष्ट गेय पदों की रचना की।