घरनी
घरनी, घरणि या घरणी का सामान्य अर्थ है स्त्री अथवा पत्नी। परन्त संत या योग साहित्य में इसका अर्थ भिन्न है। सिद्धों की साधना पद्धति की तीनो वृत्तियों - अवधूती, चाण्डाली तथा डोम्बी या बंगाली - का नाम है घरणी। घरणी से इन तीनों का बोध होता है।संत साहित्य में जो 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' जैसी उलटबांसियां कही जाती हैं उसका विशेष अर्थ भी है। सामान्य अर्थ में तो इससे लोग समझते हैं कि यदि घर में स्त्री नहीं है तो वह घर भूत के निवास स्थल के समान है। परन्तु संत साहित्य में घर का अर्थ है शरीर, घरनी का अर्थ है साधना, और भूत का अर्थ है शव। अर्थात् बिना साधना के यह शरीर मुर्दे के समान है।
श्रेष्ठता क्रम में अवधूती सबसे नीचे, चाण्डाली श्रेष्ठतर तथा डोम्बी सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
अवधूती में द्वैत का ज्ञान बना रहता है जो साधना के क्रम में चाण्डाली तक पहुंचते-पहुंचते एकाकार होने लगता है। ऐसी चाण्डाली अवस्था में कभी यह ज्ञान रहता है तथा कभी नहीं रहता। परन्तु डोम्बी साधना में द्वैत का ज्ञान समाप्त हो जाता है तथा साधक विशुद्ध अद्वैत के ज्ञान में जीने लगता है।