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छंदशास्त्र

छंदशास्त्र, जिसे पिंगलशास्त्र भी कहते हैं, वह शास्त्र है जिसमें छन्दों की उत्पत्ति, आदि आचार्च, परम्परा, भेद-प्रभेद, जाति, लक्षण-उदाहरण, रचनाविधि, विस्तार-संख्या, वर्गीकरण आदि छन्द से सम्बंधित पक्षों का अध्ययन और विचारण शामिल होता है।

छंदशास्त्र को अनेक विद्वान काव्यशास्त्र मानते हैं परन्तु अनेक विद्वान दोनों में भेद करते हैं तथा कहते हैं कि छंदशास्त्र तो काव्यशास्त्र के अन्तर्गत आता है।

छन्दशास्त्र का प्रारम्भ पिंगलाचार्य के छन्द-सूत्र ( ई. पू. 200) से होता है। इसके पूर्व छन्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है तथा छन्द को वेद के छह अंगों में एक, तथा वेदों का चरण भी कहा गया है। वेदों में प्रयुक्त छन्दों का विवरण भी उनमें मिलता है। इतना ही नहीं, शांखायन के धौतसूत्र एवं निदानसूत्र, ऋक्प्रातिशाश्य के षोडश पटल, कात्यायनकृत ऋग्वेद एवं यजुर्वेद की अनुक्रमणिका आदि में भी प्रयुक्त छन्दों का विवरण मिलता है, परन्तु शास्त्र के रूप में यह छन्द-सूत्र में ही दिखायी देता है।

छन्दशास्त्र की चार प्रमुख शैलियां हैं - सूत्रशैली, श्लोकशैली, एकनिष्ठ शौली, तथा मिश्रित शैली।

पिंगलाचार्य तथा आचार्य हेमचन्द्र की रचना सूत्रशैली में है जबकि अग्निपुराण तथा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में श्लोकशैली अपनायी गयी है। गंगादास एवं केदारभट्ट ने एकनिष्ठ शैली का प्रयोग किया है जिसमें उदाहरण वाले पद्य उसी छन्द में हैं जिस छन्द की परिभाषा और लक्षण हैं। प्राकृतपैंगलम् में मिश्रित शैली का प्रयोग किया गया है।

भारत में छन्दशास्त्र के विकास की एक लम्बी परम्परा है जो आज भी जारी है। छन्दों के नये वर्गीकरण के प्रयास भी किये गये हैं और तुक आदि नये विषय भी उसमें शामिल किये गये हैं।

Page last modified on Tuesday February 21, 2017 05:39:13 GMT-0000