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छेकानुप्रास

छेकानुप्रास एक अलंकार है। जब किसी कविता में किसी शब्द की आवृत्ति एक बार हो, अर्थात् वह शब्द दो बार आये, तो उसे छेकानुप्रास कहते हैं।

उदाहरण – रीझि रीझि रहसि रहसि हंसि हंसि उठै,
सांसै भरि आंसू भरि कहत दई दई।
- देव

भगवान दीन ने एक वर्ण की आवृत्ति को भी छेकानुप्रास माना है। इसका उदाहरण ब्रजभाषा के कवि रत्नाकर की पंक्तियों में देखें -

मुक्ति मुकता को मोल माल ही कहां है,
जब मोहन लला पै मन मानिक ही वारी चुकी।

Page last modified on Friday February 24, 2017 05:58:20 GMT-0000