छेकानुप्रास
छेकानुप्रास एक अलंकार है। जब किसी कविता में किसी शब्द की आवृत्ति एक बार हो, अर्थात् वह शब्द दो बार आये, तो उसे छेकानुप्रास कहते हैं।उदाहरण – रीझि रीझि रहसि रहसि हंसि हंसि उठै,
सांसै भरि आंसू भरि कहत दई दई।
- देव
भगवान दीन ने एक वर्ण की आवृत्ति को भी छेकानुप्रास माना है। इसका उदाहरण ब्रजभाषा के कवि रत्नाकर की पंक्तियों में देखें -
मुक्ति मुकता को मोल माल ही कहां है,
जब मोहन लला पै मन मानिक ही वारी चुकी।