जैन धर्म
जैन धर्म भारत के प्राचीन धर्मों में से एक है। यह एक अनीश्वरवादी धर्म है परन्तु इसमें मनुष्य के लिए देवत्व प्राप्त करने की सम्भावना व्यक्त की गयी है।अहिंसा इसका परम धर्म है। यह कहता है कि मनुष्य को मन, वचन तथा कर्म सभी प्रकार से अहिंसा का पालन करना चाहिए तथा इससे ही मानव का कल्याण संभव है। जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ निम्न प्रकार हैं।
जैन दर्शन के चार मूल सूत्र – आवश्यक सूत्र, विशेष आवश्यक सूत्र, दशवैकालिक सूत्र, तथा पाक्षिक सूत्र।
ग्यारह अंग – आचाराङ्ग सूत्र, सुयगडाङ्ग सूत्र, ठाणाङ्ग सूत्र, समवायाङ्ग सूत्र, भगवती सूत्र, ज्ञाताधर्मकथा सूत्र, उपासकदशा सूत्र, अन्तगड़दशा सूत्र, अनुत्तरोववाई सूत्र, विपाक सूत्र, तथा प्रश्नव्याकरण सूत्र।
बारह उपाङ्ग – उववाईय सूत्र, रायपसेनी सूत्र, जीवाभिगम सूत्र, पन्नगणा सूत्र, जम्बूद्वीपपण्णति सूत्र, चन्दपन्नति सूत्र, सूरियपण्णति सूत्र, निरीयावलिका सूत्र, कप्पिया सूत्र, कपवड़ीसया सूत्र, पुप्पिया सूत्र, तथा पुप्पचूलिया सूत्र।
पांच कल्प सूत्र – उत्तराध्ययन सूत्र, निशीथ सूत्र, कल्प सूत्र, व्यवहार सूत्र तथा जीतकल्प सूत्र।
छह छेद – महानिशीथबृहद्वाचना सूत्र, महानिशीथलघुवाचना सूत्र, मध्यमवाचना सूत्र, पिण्डनिरुक्ति सूत्र, औधनिरुक्ति सूत्र, तथा पर्य्यूषणा सूत्र।
दश पयन्ना सूत्र – चतुस्सरण सूत्र, पंचखाण सूत्र, तदुलवैयालिक सूत्र, भक्तिपरिज्ञान सूत्र, महाप्रत्याख्यान सूत्र, चन्दाविजय सूत्र, गणीविजय सूत्र, मरणसमाधि सूत्र, देवेन्द्रस्तवन सूत्र, तथा संसार सूत्र।
इनके अतिरिक्त नन्दी सूत्र तथा अनुयोगोद्धार सूत्र भी प्रामाणिक माने जाते हैं।
जैन धर्म ग्रन्थों को पांच भागों में रखा गया है जिन्हें पंचाङ्ग के नाम से भी जाना जाता है। ये हैं – पूर्व सभी ग्रंथों की टीका, निरुक्ति, चरणी, तथा भाष्य नाम से चार अवयव तथा सभी मूल एक अवयव माना जाता है। इस प्रकार पांच अंग हुए तथा सभी को मिलाकर पंचांग कहा जाता है।
ढूंढिया अवयवों को नहीं मानते तथा अनेक जैनी कई अन्य ग्रंथों को भी मानते हैं।