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देवोपासना

देवोपासना

देवों की उपासना को दोवोपासना कहा जाता है।

देवोपासना के तहत देवों की पूजा-अर्चना, प्रार्थना, धर्मग्रंथों का पाठ, यज्ञ और अन्य शास्त्रीय विधियां आती हैं।

देवोपासना के सम्बंध में शास्त्रों का निर्देश है - देवो भूत्वा यजेद्देवम्। अर्थात् देवों की पूजा स्वयं देवता बनकर की जानी चाहिए।

यहां देवता बनने का अर्थ है मन, वचन और कर्म से, तथा शरीर की आन्तरिक एवं वाह्य शुद्धता एवं पवित्रता को धारण करना।

वाह्य शुद्धता एवं पवित्रता के लिए स्नान किया जाता है या जल से शरीर को धोया जाता है।

आन्तरिक शुचिता का अर्थ मन को कुत्सित भावनाओं से मुक्त करना है।

उसके बाद करन्यास, हृदयादिन्यास आदि से शरीर में मंत्रों की स्थापना की जाती है और उसके बाद षोडषोपचार पूजा विधि से देवपूजन किया जाता है।

करन्यास में दोनों हाथों की दस अंगुलियों और दोनों हाथों के सामने तथा पीछे के भाग को क्रमशः मंत्रोचारण करते हुए बारी बारी से स्पर्श किया जाता है। जैसे मंत्रों में नमः के बाद दोनों हाथों के अंगुठों के अग्रभाग से परस्पर स्पर्श, फिर मंत्रोच्चार के बाद तर्जनियों का स्पर्श, फिर मध्यमाओं का स्पर्श, फिर अनामिकाओं का स्पर्श, फिर कनिष्ठाओं का स्पर्श, फिर करतलों का स्पर्श, फिर करतलपृष्ठों का स्पर्श।

ह़दयादिन्यास में मंत्रोच्चारण के बाद दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों से ह़दय का स्पर्श, मंत्रोचारण के बाद इति शिरसे स्वाहा कहकर दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों से मस्तक का स्पर्श, फिर शिखायै वषट् कहकार शिखा का स्पर्श, फिर इति कवचाय हुम् कहकर दायें हाथ की पांचों अंगुलियों से बायें कंधे का तथा बायें हाथ की पांचों अंगुलियों से दायेें कंधे का एक साथ स्पर्ष, मंत्रोच्चार के बाद इति नेत्रत्रयाय वौषट् कहकर दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों तथा ललाट के मध्य भाग जहां गुप्त रूप से तीसरा ज्ञाननेत्र रहता है का स्पर्श किया जाता है।

और अन्त में विहित मंत्र के बाद इति अस्त्राय फट् कहकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से उलटा अर्थात् बायीं तरफ से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी तरफ से आगे लाकर तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियों से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजाया जाता है।

इसके बाद जिस उद्देश्य से पूजन किया जाता है उस उद्देश्य का उल्लेख कर संकल्प किया जाता है।

Page last modified on Sunday July 13, 2014 16:14:44 UTC : Initial version
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