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नन्ददास

नन्ददास (1533 – 1586) एक संत कवि थे। उनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

ब्रज क्षेत्र के इस विख्यात संत के जीवन के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु इतना तो मालूम है कि इनकी गिनती महान वैष्णव संतों में होती है।

कहा जाता है कि नन्ददास दीक्षित होने से पूर्व किसी स्त्री के अनुचित प्रेम में फंसे थे तथा कुरुक्षेत्र से मथुरा तक उसके पीछे-पीछे आ गये थे। जब नाविक ने उन्हें यमुना पार नहीं कराया तो वह यमुना किनारे ही यमुना की स्तुति करने लगे। जिस स्त्री पर वह आसक्त थे उसके पति से ही वल्लभाचार्य ने उन्हें बुलवाया तथा श्रीकृष्ण के अलौकिक प्रेम की दीक्षा दी। कहते हैं कि इस तरह उनका लौकिक प्रेम अलौकिक हो गया। कृष्णभक्ति में उन्हें अपने सभी दोषों से मुक्ति मिल गयी।

बाद में नन्ददास की आकांक्षा रही कि पंडितों को कविताओं के माध्यम से कृष्ण भक्ति की ओर आकर्षित किया जाये। उनमें पंडितों को तर्क के आधार पर विश्वास दिलाने तथा अपने सिद्धान्तज्ञान को प्रदर्षित करने की प्रवृत्ति भी हो गयी थी। परन्तु कभी भी उनका पांडित्य उनके कवित्व पर हावी नहीं रहा। उनकी प्रमुख रचनाओं - रासपंचाध्यायी तथा भंवरगीत – में भी ऐसा देखा जा सकता है जिसमें उनकी तार्किकता तथा दार्शनिक दृष्टिकोण के अतिरिक्त पुष्टिमार्ग के भक्ति सिद्धान्त मिलते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्तपंचाध्यायी में भी केवल भक्ति का स्वरूप स्पष्ट किया, कोई दार्शनिक विवेचन नहीं। गुरु महिमा, नाम महिमा और विनय आदि पदों में भी उनकी भक्ति की भावना ही प्रबल रही। उनकी रचनाओं में अधिक श्रृंगार रस से ओत-प्रोत हैं।



Page last modified on Saturday February 1, 2014 10:36:28 GMT-0000