पलना
पलना एक लोकगीत है जो बच्चे के जन्म के बाद आयोजित होने वाले छठी, अर्थात् जन्म के छठे दिन, के रस्म के अवसर पर गाया जाता है। यह जच्चे (जननी) से सम्बंधित गीतों में से एक है। इस गीत का नाम पालना भी है। इसे इस नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि इसमें शिशु को पालने में झुलाने का उल्लेख होता है। इस अवसर पर जच्चे के सगे संबंधी एकत्रित होते हैं, विशेषकर महिलाएं और वे यह गीत गाती हैं। वैसे तो छठी सम्पूर्ण भारतवर्ष में आयोजित होता है, लेकिन पालना या पलना लोकगीत मुख्य रूप से ब्रज और अवध क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। इसमें नवजात शिशु का स्वागत किया जाता है और उसकी दीर्घायु की कामना की जाती है। वैसे महिलाएं पालना लोकगीत बच्चों को सुलाने के समय भी गाती हैं। ब्रज और बुंदेलखंड की महिलाएं कृष्ण और उन्हें पालने वाली मां यशोदा के प्रसंग वाले गीत गाती हैं जबकि अवध क्षेत्र में राम और उनकी मां कौशल्या के प्रसंगों वाले गीत गाये जाते हैं। यह ढोलक और मंजीरे की थाप पर गाया जाता है और उनमें तरह तरह के पालने, जैसे पीतल, चंदन की लकड़ी आदि की चर्चा होती है और उन्हें झुलाने के लिए रेशम की डोर की भी।