पलायनवाद
वस्तुस्थिति से पलायन करने को पलायनवाद कहा जाता है। यह मनुष्य की ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें वह जीवन के यथार्थ का सामना करने से कतराता है या उसकी अनिवार्यताओं की उपेक्षा करता है। वह उत्तरदायित्व का निर्वाह न कर जीवन को किसी अन्य तरीके से आनन्द में गुजारने का उपक्रम करता है। साहित्य में जब ऐसी प्रवृत्ति को अभिव्यक्त किया जाता है तो उसे पलायनवादी साहित्य कहते हैं। हिन्दी में छायावाद पलायनवादी साहित्य का उदाहरण है। पलायनवादी कवि जीवन के यथार्थ से कहीं दूर जाने की बात कहता है। उदारहण से लिए जयशंकर प्रसाद की यह कविता उद्धृत है -ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक, धीरे-धीरे।
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कोने में गहरी,
निश्चल प्रेम कथा कहती हो
तज कोलाहल की अवनी रे।
पलायनवाद के दो विशेष रुप हैं - हृदयवाद और निराशावाद। हृदयवाद में काल्पनिक सौन्दर्य की बात होती है और निराशावाद में निराशा की, और दोनों अति पर चले जाते हैं। इस तरह से पलायनवाद में जीवन के कठोर यथार्थ से पलायन करने की ही अभिव्यक्ति होती है।