पवाड़ा
पवाड़ा एक लोकछन्द है। इसे पोवाड़ा नाम से भी जाना जाता है। यह लोकछन्द विशेष रूप से भारत के महाराष्ट्र राज्य में प्रसिद्ध है। यह वीर गीत है जिसकी विषयवस्तु और शैली राजस्थानी चारणों की विरुदावली जैसी होती है। इसे ऊंची आवाज में गाया जाता है और इसकी संगति डफ और तुनतुनिया जैसे वाद्यों के साथ की जाती है। चुंकि यह वीर गीत है इसलिए स्वाभाविक ही वीरों के पराक्रम इसमें गाये जाते हैं। उनकी बुद्धि, कौशल, कीर्ति, प्रशस्ति, स्तुति आदि भी इनमें शामिल होता है।इनमें परमार या पवारों के प्रशस्ति गीत होते हैं जिनका एक समय भारत के एक विशाल भूभाग में शासन था। महाराष्ट्र के पवार तो प्रसिद्ध हैं। संभवतः यही कारण है कि इन लोकगीतों को पवारा या पमारा भी कहा जाता है। यह लोकछन्द व्रज में पमारा और मालवा में पवारा नाम से जाना जाता है। बुंदेलखंड में भी इसी शैली की एक कथा गीत भी प्रचलित है। इसलिए पवारा या पमारा बाद में लोकगीत की एक शैली का नाम ही हो गया, जैसे बिहार में कुंवर सिह का पमारा, मालवा में कुंवर चेन सिंह का पमारा, और व्रज में जगदेव का पवारा।
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पशु, पश्चिम बंगाल, पश्चिमी हिन्दी, पहर, पहेली