पशु
पशु का सामान्य अर्थ है जीव। वैज्ञानिक शब्दावली में प्राणी जगत को दो भागों में बांटा गया है - पशु जगत और वनस्पति जगत। भारतीय दर्शन परम्परा में शैव मत जीव को ही पशु कहता है क्योंकि उसका मानना है कि यह पाश में बंधा हुआ है। पशुपति शैव मत में ईश्वर हैं। इसकी तुलना वेदान्त के जीव से की जा सकती है, जो माया के बंधन में है, और ब्रह्म इस मत में ईश्वर हैं। वेदान्त के यही माया, जीव ,और ब्रह्म शैव मत के पाश, पशु और पशुपति हैं। सांसारिक विषयों की आसक्ति में बंधे रहने वाले मनुष्य को इसी कारण पशु कहा गया। कौल साधना पद्धति में साधकों की तीन श्रेणी है - जिसमें पशु को सबसे निम्न कोटि में रखा गया है, जिसके बाद वीर और दिव्य साधक आते हैं। पशु साधकों की साधना पद्धति भी भिन्न है। पशुपति, अर्थात् शिव, को पाश मुक्त माना गया है। परशुराम कल्पसूत्र में कहा गया है कि शरीर के आवरण में शिव ही जीव है, तथा आवरणमुक्त ही परम शिव है। महासिद्ध सर्वानन्द ने अपने सर्वोल्लास नामक ग्रंथ में पशुओं के भी तीन प्रकार बताये हैं - पशु, सभावपशु, और विभावपशु। पशु के लिए आहार, निद्रा, भय और मैथुन से आगे कुछ भी नहीं है। यही उसका पाशविक जीवन है। उसके अन्दर कोई अन्य भाव नहीं होता। सभावपशु में भाव या चेतना होती है परन्तु वह स्थिर या प्रबल नहीं होती। विभावपशु की चेतना स्थिर और प्रबल होती है। वही विभावपशु पशुत्व की सीमा लांघ जाता है तथा वीर साधक हो जाता है। आगे जाकर वीर साधक सभाववीर और विभाववीर साधक बनता है। फिर अन्त में वह सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करते हुए दिव्य साधक बनता है। सकलपशु, प्रतयकलपशु, और विज्ञानकलपशु नाम से तीन अन्य वर्गीकरण भी किये जाते हैं। सकलपशु अणु, भेद, और कर्म नामक तीन मलों से युक्त रहता है। प्रतयकलपशु अणु और कर्म से युक्त तथा विज्ञानकलपशु अणु नामक मल से युक्त रहता है।