पाशुपत
पाशुपत प्राचीन भारत में एक सम्प्रदाय था। यद्यपि यजुर्वेद और महाभारत में भगवान शिव का पशुपति के रूप में वर्णन मिलता है, पाशुपत सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य लकुलीश का काल ईसा के बाद के प्रारंभिक सदी का कुषाणयुग बताया जाता है। माधव के सर्वदर्शन संग्रह में उनका मत नकुलीश पाशुपत के नाम से मिलता है। लकुलीश को श्रीकण्ठ का शिष्य और महेश्वर का अन्तिम अवतार भी कहा जाता है। उनका गहरा प्रभाव तमिल शैवों पर पड़ा। बाद में इस सम्प्रदाय की कापालिक, कालमुख, भैरव, वीर शैव, और रसेश्वर शाखाएं अस्तित्व में आयीं। बाद में पाशुपत सम्प्रदाय सोमसिद्धान्त के माध्यम से शाक्त मत से भी जुड़ा। तमिल शैव मत के ग्रंथ शैवज्ञानबोधम्, जिसके रचयिता मेयकण्डार हैं, में 12 सूत्रों में पाशुपत मत को अभिव्यक्त किया गया है। इसके अनुसार पशुपति, पाश, और पशु नामक तीन सत्ताएं हैं। पशु का पाश से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करने की बात कही गयी है। इस सिद्धान्त की विवेचना अथर्वशिरः और कैवल्य उपनिषदों में भी की गयी है।इस मत का न केवल भारत में बल्कि, जावा, कम्बोज, चम्पा आदि देशों में विस्तार का उल्लेख फाह्यान के यात्रा वृतांत में मिलता है। मोहन जोदड़ो में मिली योगी की प्रतिमा के भी पाशुपत सम्प्रदाय से जोड़ जाता है, परन्तु इसपर अभी मतैक्य नहीं है।