पालि भाषा और साहित्य
पालि प्रचीन मगध प्रदेश और मध्य देश की भाषा थी। इस भाषा का पालि नाम क्यों पड़ा इसमें मतभेद हैं। अनेक विद्वान पालि शब्द की उत्पत्ति पंक्ति, परियाय, पल्लि, या पाटलिपुत्र से बताते हैं, परन्तु अधिकांश विद्वान मानते हैं कि पालि क अर्थ रक्षा करना है, और इसलिए जिस भाषा में बुद्ध के वचनों की रक्षा की गयी, या जिसमें उन्हें संभालकर रखा गया, उसे पालि कहा गया। भगवान बुद्ध ( ई.पू लगभग 563 - ई.पू 483 ) के काल में पालि मगध प्रदेश में आम लोगों की भाषा थी जिसमें भगवान बुद्ध ने उपदेश दिये थे। इस भाषा का व्याकरण मध्य देश की भाषा का है।बुद्ध के उपदेशों को उनके शिष्यों ने संकलित किया। परम्परा के अनुसार इनका संकलन बुद्ध की मृत्यु के बाद ई.पू 483 में राजगृह की प्रथम सभा में महाकाश्यप के नेतृत्व में हुआ था। उस संकलन का नाम था विनयपिटक। वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं के विनय के विरुद्ध आचरण करने के कारण 100 वर्षों बाद वहां दूसरी संगति या सभा हुई, जिसमें महास्थविर रैवत तथा सर्वकामी मुख्य थे। तीसरी संगति सम्राट अशोक (ई.पू. 264-ई.पू. 227) ने करवायी जिसमें पिटकों को अन्तिम रूप दिया गया। सुत्तपिटक के सिद्धान्तों के आधार पर अभिधम्मपिटक अस्तित्व में आया। इन्हीं तीनो पिटकों को त्रिपिटक कहा गया जो पालि भाषा में ही है। तीसरी संगति में पड़ोसी देशों में धर्म प्रचारकों को भेजे जाने का भी निर्णय हुआ था। निर्णय के अनुसार, जैसी की परम्परागता मान्यता है, अशोक के पुत्र महिन्द्र को लंका भेजा गया था, जिनके साथ त्रिपिटक भी वहां गये और ये थेर या स्थविरवादियों के मुख्य धार्मिक ग्रंथ हो गये।
विनयपिटक में बुद्ध की वे शिक्षाएं संग्रहित हैं जो उन्होंने संघ के संचालन को सुनियोजित करने के लिए दी थीं। इसमें दो विभाग हैं - 1. सुत्तविभंग और 2. खन्धक। सुत्तविभंग में दे भाग हैं - 1. पाराजिक और 2. पाचित्तिय। खन्धक में तीन भाग हैं - 1. महावग्ग, 2. चुल्लवग्ग, और 3. परिवार।
सुत्तपिटक में बुद्ध के साधारण बातचीत के आधार पर उपदेश सूत्रों में संग्रहित हैं। इसमें सारिपुत्त तथा मोग्गलान आदि के कुछ सूत्र या उपदेश भी शामिल हैं। इसमें पांच निकाय हैं - 1. दीघनिकाय, 2. मज्झिम निकाय, 3. संयुक्त निकाय, 4.अंगुत्तर निकाय, और 5. खुद्दक निकाय।
दीघनिकाय लम्बे, और मज्झिम निकाय मध्यम आकार के सूत्रों का संग्रह है। संयुक्त और अंगुत्तर निकाय आकार में दीघ और मज्झिम निकायों से बड़े हैं, और वे अन्य निकायों के पूरक हैं।
खुद्दक निकाय छोटे-छोटे सूत्रों का संग्रह है और इसमें 15 ग्रंथ हैं - 1. खुद्दकपाठ, 2. धम्मपद, 3. उदान, 4. इतिवुत्तक, 5. सुत्तनिपात, 6. विमानवत्थु, 7. पेतवत्थु, 8. थेरगाथा, 9. थेरीगाथा, 10. जातक, 11. निद्देस, 12. पटिसंम्भिदामग्ग, 13. अपादान, 14. बुद्धवंस, और 15. चरियापिटक।
अभिधम्मपिटक में सात ग्रंथ हैं - 1. धम्मसंगिनि, 2. विभंग, 3. कथावत्थु, 4. पुग्गलपज्जत्ति, 5. धातुकथा अथवा धातुकथापकरण, 6. यमक, 7. पट्ठानप्पकरण अथवा महापट्ठान।
धम्मसंगिनी में धर्मों का पूर्ण विश्लेषण और विभाजन किया गया है, जैसे कुसलाधम्म, अकुसलाधम्मा, अव्याकताधम्मा आदि। परन्तु ध्यान रखना चाहिए कि बौद्ध धर्म में आत्मा को स्वीकार नहीं किया गया है। इसके अनुसार मनुष्य चित्त और शरीर का संघात मात्र है। शरीर ही रूप है और चित्त में चार आकार है - वेदना, संज्ञा, संखार, और विज्ञान। बौद्ध धर्म में संघात की इन अवस्थाओं को ही धम्म कहा गया है। अभिधम्मपिटक के शेष छह गंथों में इन्हीं धर्मों के स्वरुपों और उनके परस्पर सम्बंधों पर विचारण किया गया है।
अभिधम्मपिटक में परमार्थ कि दृष्टि से अभिधम्म के चार विषय बतलाए गए हैं - 1. चित्त अर्थात् किसी वस्तु को जानने वाला, 2. चैतसिक अर्थात् चित्त से संयुक्त रहने वाला, 3. रूप, जो विकार स्वभाव वाला है, और 4. निर्वाण, अर्थात् तृष्णा से विमुक्त।
पालि में त्रिपिटक से अलग साहित्य के दो युग हैं जिन्हें प्रथम युग और द्वितीय युग के नाम से जाना जाता है।
प्रथम युग (बुद्ध के काल से लेकर 4थी सदी तक) की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना "मिलिन्दपञ्हो" है, जिसे मिलिन्दप्रश्न के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बैक्ट्रिया के राजा मिनैन्डर (मिलिन्द) के प्रश्न और नागसेन नामक बौद्ध भिक्षु के उत्तर हैं। यह ग्रंथ स्थविरवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधि ग्रंथ है। अभी तक यह ज्ञात नहीं है कि इस ग्रंथ के रचयिता कौन हैं। यद्यपि यह ग्रंथ पालि भाषा में है, इसकी शैली संस्कृत की लेखन शैली के अधिक निकट है।
दि्वतीय युग 5वीं से 11वीं शताब्दी के बीच माना जाता है। त्रिपिटक की अट्ठकथाएं अर्थात् अर्थकथाएं इस युग के प्ररम्भिक स्रोत माने जाते हैं। पालि अट्ठकथाओं का मूल आधार लंका की सिंहली भाषा की अट्ठकथाएं हैं। बुद्धघोष (5वीं शताब्दी) अट्ठकथाओं के प्रणेता थे। विनयपिटक पर आधारित उनकी अट्ठकथाएं हैं - समन्तपासादिका (विनयपिटक की अट्ठकथा), कंग्वावितरणी (पातिमोक्ख की अट्ठकथा)। सुत्तपिटक पर आधारित उनकी अट्ठकथाएं हैं - सुमंगलविलासिनी (दीघनिकाय की अट्ठकथा), पपंचसूदनी (मज्झिम निकाय की अट्ठकथा), सारत्थपकासिनी (संयुक्त निकाय की अट्ठकथा), मनोरथपूरणी - अंगुत्तर निकाय की अट्ठकथा, परमत्थजोतिका (खुद्दकनिकाय के खुद्दकपाठ तथा सुत्त-निपात की अट्ठकथा। अभिधम्मपिटक पर आधारित अट्ठकथाएं हैं - अट्ठसालिनी (धम्मसंगिनी की अट्ठकथा), सम्मोहविनोदिनी विभंग की अट्ठकथा, पपंचप्पकरण कथा (अभिधम्मपिटक की धातुकथा, पुग्गलपञ्ञत्ति, कथावत्थु, यमक, तथा पट्ठानप्पकरण की अट्ठकथा।
बुद्धघोष की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है विसुद्धिमग्ग, जिसे विशुद्धिमार्ग के नाम से भी जाना जाता है। इसमें उन्होंने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का स्पष्टीकरण दिया है। उनकी अन्य कृतियों के नाम हैं - जातकट्ठकथा जिसे जातक की अर्थकथा के नाम से भी जाना जाता है।
बुद्धघोष के समकालीन बुद्धदत्त ने बुद्धवंस पर मधुरत्थविलासिनी नामक अट्ठकथा की रचना की थी जिसे मधुरत्थपकासिनी नाम से भी जाना जाता है।
आनन्द ने मूलटीका और अभिधम्मटीका की रचना की थी। धम्मपाल की परमत्थदीपनी टीका भी प्रसिद्ध है। अनेक अन्य टीकाएं, जो अलग-अलग काल के हैं, धम्मपाल नामक रचनाकारों के नाम से रचित मिलते हैं। संभव है कि धम्मपाल नाम से कई व्यक्ति हों। चुल्लधम्मपाल, उपसेन महानाम, कस्सप, वजिरबुद्धि, खेम, अनुरुद्ध आदि अन्य टीकाकार भी उल्लेखनीय हैं।
धम्मसिरि द्वारा रचित 'खुद्दसिक्खा' और महासामिन की 'मूलसिक्खा' भी महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं जिनका सम्बंध विनयपिटका से है। ये पद्य रचनाएं हैं और इनमें भिक्षुओं के लिए संघ सम्बंधी नियम संग्रहित हैं। ये रचनाएं ग्यारवहीं शताब्दी के बाद की मानी जाती हैं।
पालि इतिहास ग्रंथ हैं 'दीपवंस' और 'महावंस'। ये सिंहल के इतिहास हैं तथा इनके विषय भी एक ही हैं। दोनों के वर्णन क्रम भी एक जैसे हैं। दीपवंस नीरस और शुष्क है तथा पहले लिखी गयी है जबकि महावंस एक सरस रचना है और इसे एक श्रेष्ठ महाकाव्य भी माना जाता है।
निकटवर्ती पृष्ठ
पावापुरी, पाश, पाशुपत, पिंगल, पिंगलकाव्य