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भाषा

भाषा मनुष्यों के बीच संवाद करने का वह साधन है जिसे ध्वनियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। ध्वनियों को वर्णों में दर्ज किया जाता है और वर्णों को शब्दों में। इसका बोलने और लिखने दोनों में प्रयोग किया जाता है। केवल बोलचाल अथवा वाणी में, इस्तेमाल होने वाले संवाद को बोली कहते हैं।

मूल ध्वनियों को अक्षरों में लिपिबद्ध किया जाता है, जिसे वर्ण कहते हैं, और यह पूरी प्रणाली वर्णमाला कहलाती है। जिन ध्वनियों को बिना किसी अन्य ध्वनि के ही उच्चारित किया जाता है उसे स्वर वर्ण कहते हैं, और जिन ध्वनियों को स्वर वर्ण की सहायता से ही उच्चारित किया जाता है उसे व्यंजन वर्ण कहते हैं।

प्रत्येक भाषा का एक व्याकरण होता है। भाषा दो तरह की होती हैं - संश्लेषणात्मक और विश्लेषणात्मक। संश्लेषणात्म भाषा में शब्दों का क्रम किसी भा तरह का हो सकता है परन्तु उसका अर्थ नहीं बदलता, जैसे संस्कृत। इसमें कहा जा सकता है - राम: दशरथस्य पुत्रः, दशरथस्य रामः पुत्रः, या पुत्रः दशरथस्य रामः। इसका अर्थ नहीं बदलता। परन्तु विश्लेणात्मक भाषा में, जैस हिन्दी, शब्दों का क्रम बदलने से अर्थ बदल जाता है - जैसे राम दशरथ के पुत्र, को दशरथ राम के पुत्र नहीं कह सकते।

भाषा चार प्रकार के हैं - शरीर की भाषा, मौखिक भाषा, लिखित भाषा, और अब डिजिटल भाषा। शरीर की भाषा से नाटक, फिल्म और अभिनय का विकास हुआ। मौखिक भाषा से गायन, परस्पर संवाद, नाटकों के कथोपकथन, व्याख्यान, प्रवचन आदि का विकास हुआ। लिखित भाषा से सभी विषयों का विकास हुआ जिन्हें लिपिबद्ध किया गया। अब डिजिटल भाषा से कम्प्यूटर और इंटरनेट आदि का। शारीरिक, मौखिक, और लिखित भाषा की सीमा यह थी कि इसे पूर्व अनुभव के बिना नहीं समझा जा सकता। जैसे बाघ शब्द को स्रोता बिना बाघ देखने के अपने पूर्व अनुभव के, जिसमें चित्रों का देखना भी शामिल है, नहीं समझ सकता। लेकिन डिजिटल भाषा में चित्र और शब्द एक साथ बाताये जा सकते हैं जिसे व्यक्ति बिना पूर्व अनुभव के समझ सकता है।

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