Skip to main content
(Cached)

भाषण कला

भाषण कला एक विधा है जिसमें वक्ता अपनी बात से श्रोताओं को आकर्षित करने की कोशिश करता है। इसे वक्तृत्व कला भी कहा जाता है, जो व्याख्यान, प्रवचन, उपदेश से भिन्न है। भाषण कला का उपयोग साहित्य की एक विधा के रुप में प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है।

प्राचीन यूनान में भाषण कला को अत्यन्त गरिमा प्राप्त हुई। भाषण-शास्त्र का विकास भी पश्चिमी देशों में हुआ। इसमें वाक् शैली का स्तर समान्य बोलचाल की भाषा से काफी ऊंचा होता है। परन्तु प्लेटो ने इस कला का विरोध किया था क्योंकि उनका मानना था कि इस कला का उपयोग सत्य की अवहेलना के लिए किया जाता है। उन्होंने भाषण कला के तीन आधार बतलाए। वे हैं - प्रवृत्ति, ज्ञान, और अभ्यास। उन्होंने इसमें स्पष्टता, क्रम, तारतम्य, तथा सामंजस्य के नियमों की बात की। आईसॉक्रेटीज ने 392 ई. पू. के आस-पास एथेंस में अपने प्रसिद्ध रिटोरिक (वक्तृत्व या भाषण कला) स्कूल की स्थापना की थी। यह पश्चिमी इतिहास में उच्च शिक्षा और भाषण कला का पहला स्थायी संस्थान माना जाता है। उन्होंने भाषण शास्त्र के मानवीय, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक महत्व पर बल दिया। उन्होंने विषय, औचित्य, भाषा-प्रयोग, अलंकारों आदि के प्रयोग पर विवेचना की, तथा भाषण कला के चार अंग बताए - प्रक्कथन, वर्णन, प्रमाण, तथा उपसंहार।
अरस्तु ने विषय के चयन पर बल दिया और आईसॉक्रेटीज के अंगों को माना। स्पष्टता और औचित्य को उन्होंने श्रेष्ठ भाषण शैली का गुण बताया। वाक्य एवं शब्दविन्यास तथा शब्दों के चयन के महत्व की बात करते हुए उन्होंने कहा कि शब्द प्रचलित होना चाहिए, परन्तु अप्रचलित शब्दों का उपयोग भाषा के चमत्कार के लिए किया जा सकता है।

भाषण-शास्त्र का विकास और विस्तार बाद मे रोम में हुआ। वहां के विद्वानों ने भाषा की शुद्धता पर बल दिया और लम्बे वाक्यों, बहुअर्थी शब्दों, और तुकबंदियों आदि के उपयोग के प्रति सतर्क किया। वहां सिसरो 10 वीं शताबादी के प्रमुख विचारक हुए जिन्होंने अलंकारों के समुचित प्रयोग को शालीनता और प्रभावशाली बनाने के लिए मान्य बताया। उन्होंने भाषण कला को मानवीय विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।

यूरोप में 14वीं और 15वीं शताब्दी में पुनर्जागरण काल के दौरान भाषण कला में भी नये मानदंड स्थापित हुए तथा इसे शब्दाडम्बर से मुक्त किया गया। विचार के महत्व को प्रतिपादित किया गया तथा इसका उद्देश्य शिक्षा, प्रबोधन, और उत्तेजना उत्पन्न करना माना गया। भाषण कला का विस्तर हुआ और इसमें अलंकार, उपदेश, कहावत, उपमा, मिथक कथाएं आदि भी शामिल किये गये। स्पष्टता और संक्षिप्त कथा भाषण कला का प्रमुख गुण माना गया। फिर भी 15वीं शताब्दी में शब्दजाल का प्रयोग होता था। लेकिन 16वीं शताब्दी में पुनः प्राचीन यूनान और रोम की भाषण कला के सिद्धान्तों को मान्यता मिलने लगी। शब्दों के चयन और भाषण के परिस्थितियों के अनुकूल होने पर बाल दिया गया।

19वीं तथा 20वीं शताब्दी आते-आते भाषण कला का क्षेत्र काफी सीमित होकर लगभग राजनीतिक ही रह गया। फिर भी अनेक वक्ता हुए जिनके भाषण साहित्यिक श्रेणी में आते हैं।

भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भाषण कला का उपयोग राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने के लिए हुआ। राजनीतिक क्षेत्र में मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, बालगंगाधर तिलक राजगोपालाचारी आदि अनेक प्रसिद्ध वक्ता हुए। सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती विक्यात हैं।

अनेक साहित्यकारों ने अपने लेखन में भाषण-कला का उपयोग किया है, जिनमें हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, और रामवृक्ष बेनीपुरी आदि शामिल हैं।

निकटवर्ती पृष्ठ
भाषा, भाषाधारा, भाष्य, भिम्मा, भिस्त

Page last modified on Tuesday September 8, 2026 13:52:58 UTC