भुजंगप्रयात
भुजंगप्रयात संस्कृत, हिंदी और मराठी काव्य का एक प्रसिद्ध वर्णिक समवृत्त छंद है। प्रयात का अर्थ है सर्प की बल खाती हुई चाल। चूंकि इस छंद की लयबद्धता उसी तरह की है इसलिए इसका नाम भुंगप्रयात पड़ा। एक कथा प्रचलित है कि शेषनाग आत्मरक्षा के लिए गरुड़ को छन्दशास्त्र सुनाते हैं और बाद में भुजंगप्रयात कहते-कहते जलमग्न होकार गरुड़ के आतंक से मुक्ति पा लेते हैं।इस छन्द में कुल चार चरण, और प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं। उदाहरण के रुप में तुलसीदास के इस रुद्राष्क को लिया जा सकता है।
नमामि शमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्।।