भिस्त
भारतीय संत साहित्य में भिस्त शब्द का प्रयोग कैवल्य या अभीष्ट के अर्थ में किया गया है और कहीं-कहीं दोनों अर्थों में, या शुद्ध रूप से स्वर्ग के अर्थ में।दादू ने भिस्त का उपयोग स्वर्ग के अर्थ में किया है। कबीर ने भी भिस्त शब्द का उपयोग स्वर्ग के अर्थ में किया है, परन्तु उनका स्वर्ग और अभीष्ट दोनों हिन्दुओं के स्वर्ग तथा मुसलमानों के बहिश्त से अलग परमधाम, कैवल्य, सहजपद या शून्यपद, या निरंजन है।
कबीर की पंक्तियां हैं -
दिल नापाक पाक नहि चीन्हो तिसका मरम न जाना।
कहै कबीर भिसति छिटकाई दोजग ही मन माना।
एक अन्य पद में कबीर ने कहा - रोजा करै नमाज गुजारै कलमै भिस्ति न होई।
निकटवर्ती पृष्ठ
भीमबंध अभयारण्य, भीमबेटका की पहाड़ी गुफाएं, भुजंग, भुजंगप्रयात, भुजरियां