मति
मति का सामान्य अर्थ है बुद्धि। तुलसीदास ने इसी अर्थ में कहा है - जासु प्रभु दारूण दुख दिन्हा, तासु मति पहले हर लीन्हा। परन्तु इसका अन्य अर्थ में भी प्रयोग मिलता है।मति शब्द की उत्पत्ति मत शब्द से मानी गयी है, और तब मति का अर्थ होगा मत का निष्कर्ष। मत का सामान्य अर्थ विचार है। श्रीमद्भगवद गीता के आट्ठारहवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं -
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
अर्थात् जहां योगेश्र कृष्ण हैं, और जहां धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति है, यही मेरी मति है। यहां संजय मति शब्द का प्रयोग अपने निष्कर्ष को व्यक्त करने के लिए करते हैं।
मति तैंतीस संचारी भावों में से एक है। वागभट और हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासनों में निर्णय कर लेने को ही मति माना है। भरत ने कहा कि शास्त्रों के मनन, तथा पक्ष एवं विपक्ष का निरीक्षण करने से मति उत्पन्न होती है। मति संशय दूर करता है ऐसी मान्यता है, और इसलिए धनंजय एवं रामचन्द्र गुणचन्द्र ने भ्रान्ति के नाश को ही मति माना। हिन्दी के रीतिकालीन आचार्यों ने भी शास्त्र चर्चा से भ्रमनाश को ही मति माना है।
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