सिद्धान्ताचार
सिद्धान्ताचार तंत्र साधना का वह भाग है जिसमें साधक वेदों, पुराणों तथा उपनिषदों आदि में जो ज्ञान छुपा है, जैसे लकड़ी में अग्नि छुपी होती है, उसे जान लेता है। इसी ज्ञान को सिद्धान्ताचारी बोधि के नाम से भी जानते हैं। इसे जान लेने को बाद वह भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है। उसके बाद वह उस सत्य के प्रति निष्ठावान होकर पंचतत्वों का खुलेआम सेवन करता है। तंत्र साधकों के लिए ये पंचतत्व पंचमकार ही हैं।सिद्धान्ताचारी के लिए नित्यतंत्र में कहा गया है कि नर कपाल का पात्र एवं रुद्राक्ष की माला धारण करने वाला सिद्धान्ताचारी साक्षात् भैरव की तरह इस पृथ्वी पर भ्रमण करता है।