सूरदास
सूरदास (1478-1580 से 1585 के बीच) आगरा तथा मथुरा के बीच गऊघाट पर संन्यासी के वेश में रहते थे। वह 1499 में वल्लभाचार्य के सम्पर्क में आये तथा उनसे दीक्षा ली। वल्लभाचार्य ने उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन के कार्य में लगाया।वह किस जाति से थे इसका निर्धारण अभी तक नहीं हो सका है परन्तु कुछ उन्हें सारस्वत ब्राह्मण मानते हैं तथा कुछ ब्रह्मभट्ट। उन्होंने भी स्वयं अपनी जाति के बारे में कुछ नहीं कहा है।
सूरदास नेत्रहीन थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे जन्म से ही नेत्रहीन थे। कुछ का कहना है कि उन्होंने स्वयं अपनी आंखें फोड़ ली थीं ताकि वह इस संसार की माया न देख सकें। परन्तु एक किंवदन्ती ऐसा भी है जिसमें कहा गया कि वह किसी स्त्री पर मुग्ध थे तथा उन्होंने स्वयं उस स्त्री से अपनी आंखों फोड़वा ली थीं।
गऊघाट पर जब वल्लभाचार्य की भेंट सूरदास से हुई तो वह सूरदास की काव्य रचना प्रतिभा तथा गायन से अत्यंत प्रभावित हुए। इसलिए उन्होंने सूरदास को सम्पूर्ण भागवत की अनुक्रमणिका ही नहीं बल्कि उनका रहस्य भी बताया। उन्हें सूरदास ने हृदयंगम करते हुए पदों की रचना करते गये तथा वल्लभाचार्य को सुनाते गये। प्रेमभक्ति के अद्भूत रहस्य का उन्होंने मर्म समझा तथा हजारों पदों में श्रीकृष्ण लीला का वर्णन किया। बाद में उनके पद पुष्टिमार्ग के शास्त्र के रूप में प्रामाणिक ग्रंथ माना गया। यह अलग बात है कि उन्होंने पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय की भक्ति पद्धति पर भी पदों की रचना नहीं की थी और अपने गुरु वल्लभाचार्य की प्रशंसा में भी कुछ नहीं रचा था। उनकी रचना इतनी उत्तम थी कि उन्हें सहज ही श्रद्धा के साथ सम्प्रदाय ने अपना लिया। सूरदास को सम्प्रदाय के लोग तथा आम लोग भी स्वामी कहा करते थे।
सूरदास अपनी बाल्यावस्था से ही संसार से विरक्त होकर भगवद् भजन में लग गये थे। उनके सम्बंध में एक कथा प्रसिद्ध है कि उन्होंने छह वर्ष की आयु में ही घर-बार छोड़ दिया था। पहले वह एक तालाब के किनारे कुटी बनाकर रहते थे परन्तु वहां लोगों की भीड़ बढ़ने के कारण उन्हें माया में फंसने का भय होने लगा। इसलिए वह मथुरा चले गये परन्तु वहां चौबे पुरोहितों की वृत्तिका का नाश न हो यह सोचकर गऊघाट पर रहने चले गये। वल्लभचार्य ने उन्हें वहां से लाया तथा श्रीनाथ जी की सेवा में लगाया।
एक बार सम्राट अकबर उनसे मिलने गये तो उन्होंने उन्हें भी श्रीकृष्णभक्ति का पद ही गाकर सुनाया। उन्होंने राजा को सीधा संकेत दे दिया कि श्रीकृष्ण को छोड़कर वह किसी अन्य का यशगान नहीं कर सकते।
सूरदास की रचनाओं में श्रीकृष्ण की बाल लीला सम्पूर्ण कृष्ण काव्य में अतुलनीय है।
सूरसागर उनकी प्रमुख रचना है।