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हाव अलंकार अंगज अलंकार का ही एक भेद है तथा यह भाव अलंकार से अलग है क्योंकि हाव तो भाव से उत्पन्न होता है।
जब चित्त में भाव उत्पन्न हो जाता है तो व्यक्ति में मानसिक परिवर्तन के साथ ही शारीरिक चेष्टाएं दिखने लग जाती हैं। इन शारीरिक चेष्टाओं को अभिव्यक्त करने वाली विशिष्ट भाषा को ही हाव अलंकार कहा जाता है।
मन के भाव ही हाव के रुप में प्रकट हो जाते हैं और जिसे अलंकार के रुप में व्यक्त किया जाता है।

Page last modified on Tuesday December 11, 2012 05:34:15 GMT-0000