शुक्रवार, 15 जून, 2007

नाभिकीय दादागिरी बनाम नाभिकीय आतंकवाद

दोनों के खतरों के प्रति सजग रहे दुनिया

ज्ञान पाठक

अगले महीने अर्थात् जुलाई 2007 से नाभिकीय आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों के दमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून (द इंटरनेशनल कॉन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ एक्ट्स ऑफ न्यूक्लियर टेररिज्म) लागू हो जायेगा जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र में सारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गयी हैं। लेकिन नाभिकीय दादगिरी और नाभिकीय आतंकवाद दोनों के खतरों से दुनिया को लगातार सजग रहने की आवश्यकता पड़ेगी।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ में 22वां इंस्ट्रूमेंट (नियमावली) जमा कर दिये जाने के तीस दिनों बाद यह नियम दुनिया भर के सभी देशों में लागू होगा, ध्यान रहे कि सदस्य राष्ट्रों के इस नियम को अंगीकृत करने के लगभग दो साल बाद ऐसा होना संभव हो पा रहा है। विभिन्न देशों द्वारा इस कानून को अपने-अपने देशों में अनुमोदित करने का स्वागत सभी ओर से हो रहा है और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बैन की-मून ने भी इसका स्वागत किया है। फिर भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह प्रयास सही अर्थों में कैसे और कब तक सफल हो पायेगा। अभी यह भी देखना है कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए दुनिया भर के देश कौन सा रास्ता और साधन अपनाते हैं।

ऐसे सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जिन देशों के पास नाभिकीय हथियार हैं उनमें से ही एक अमेरिका ने अब तक के इतिहास में एटम बम का प्रयोग किया है और जापान के लाखों लोगों को मौत के घाट नाहक उतार दिया, जबकि नाभिकीय आक्रमण करने की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी थी। उसके बाद से नाभिकीय दादागिरी का दौर शुरु हुआ तथा नाभिकीय देशों ने इसे कायम रखा है। वे किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहते कि किसी भी अन्य देशों के पास नाभिकीय हथियार हो ताकि उन्हें दबाकर रखा जा सके। फिर भी भारत समेत कुछ देशों ने नाभिकीय क्षमता हासिल कर ली है।

इधर जब से आतंकवाद का दौर शुरु हुआ है और 2001 में अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय जंग शुरु किया गया है तब से यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि दुनिया के कमजोर देशों से यदि आतंकवादियों के हाथ नाभिकीय हथियार लग गये तो वे भारी विध्वंस मचायेंगे। यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कुछ देश के वैज्ञानिक और सत्ता प्रतिष्ठान आतंकवादियों को नाभिकीय प्रौद्योगिकी दे भी सकते हैं। ऐसी स्थितियों में दुनिया के समक्ष एक भारी विपदा आन पड़ेगी और नाभिकीय आतंकवाद का गंभीर खतरा होगा।

दोनों बातें अपनी-अपनी जगह पर जायज हैं और नाभिकीय दादागिरी भी जनता के लिए उतना ही दुखदायी है जितना कि नाभिकीय आतंकवाद।

लेकिन जब यह अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू हो जायेगा तब इसकी सफलता की गुणवत्त इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़े नाभिकीय राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के साथ कितना आत्मसंयम और न्यायपूर्ण व्यवहार करते हैं। ऐसा विषेश रुप से अमेरिका के बारे में कहा जा सकता है क्योंकि एक लंबे समय से उसपर अन्य कमजोर राष्ट्रों की बाहें मरोड़ने और दादागिरी करने का आरोप लगाया जाता रहा है। वह कोई न कोई बहाना बना लेता है जो कई बार सरासर गलत होते हैं – जैसे कि नाभिकीय या व्यापक संहार करने वाले हथियार विकसित करना या रखना – और जिस किसी भी देश पर आक्रमण कर देता है।

इसके अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं। ताजा उदाहरण तो इराक पर हमले का है इस बहाने कि वह व्यापक संहार करने वाले हथियारों का स्वामी है और उन्हें विकसित करने में लगा है। इराक पर आक्रमण कर उसे तबाह कर दिया गया और अमेरिका की सैन्य दृष्टिकोण से जीत भी हो गयी। लेकिन अब तक वहां कोई साक्ष्य नहीं मिला जिसके आधार पर अमेरिका के आरोपों को सही ठहराया जा सके। यह भी मानने योग्य बात नहीं कि सद्दाम हुसैन आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे थे या उन्हें व्यापक संहार करने वाले हथियार आदि से सहयोग कर रहे थे। अधिकांश यह विश्वास करते हैं कि कि इराक के भारी खनिज तेल भंडार पर जबरन कब्जा करने और संकीर्ण राजनीति के लिए ऐसा किया गया जबकि दुनिया के अधिकांश देश आक्रमण के खिलाफ थे। ऐसी सैन्य दादागिरी थी अमेरिका की जिसने संयुक्त राष्ट्र की भी कोई परवाह नहीं की। वैसे भी वह सुविधा के अनुसार संयुक्त राष्ट्र को मानता या धत्ता बताता रहा है। ऐसी दादागिरी भी आतंकवादी गतिविधियों से कम खतरनाक या पीड़ादायी नहीं होती।

ऐसी पृष्ठभूमि में गैर-नाभिकीय देशों के भय को दूर करना पहली जरुरत है, यदि हम चाहते हैं कि दुनिया विभिन्न देशों की सत्ताओं द्वारा की जाने वाली या आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हिंसा या आतंकवाद से मुक्त हो। नि:संदेह और भी आशंकाएं हैं। हम भारत का ही उदाहरण लें और भारत-अमेरिकी नाभिकीय समझौते पर गौर फरमायें। भारत को इसके अपने थोरियम के भारी भंडार का उपयोग करने से वंचित किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यह यूरेनियम का ही उपयोग करे जिसके लिए इसे विदेशों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे नाभिकीय निर्यातक देशों को भारी धनलाभ होगा। भारत ने हालांकि नाभिकीय क्षमता हासिल की है और यह एक जिम्मेदार देश भी है। फिर भी इसे नाभिकीय राष्ट्र के रुप में मान्यता देने के लिए नाभिकीय देश तैयार नहीं हैं। हमारा नेतृत्व या तो लालच, भय या कोई अन्य कारण से अमेरिका के साथ लगातार ऐसे समझौते करने को विवश हो रहा है जो भारतीय हित में नहीं है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत पर अमेरिकी दादागिरी का दबाव बढ़ता जा रहा है।

उधर आतंकवादियों की व्यापक संहार करने वाले हथियारों या नाभिकीय प्रौद्योगिकी तक पहुंच का भय भी लगातार बढ़ता जा रहा है और सही दिशा में सोचने वाले सभी व्यक्ति इस बात से चिंतित हैं।

नाभिकीय आतंकवाद आज वास्तव में सर्वाधिक गंभीर शतरा है। यदि ऐसा एक भी आक्रमण हो गया तो जान माल की व्यापक क्षति तो होगी ही, दुनिया में सदा के लिए एक अवांछित बदलाव हो जायेगा। ऐसे दुर्दिन को रोकने के लिए, संयुक्त राष्ट्र महासचिव की-मून ने कहा कि संपूर्ण मानव समाज को विवश होन ही चाहिए।

वह उम्मीद करते हैं कि नाभिकीय आतंकवाद कान्वेंशन आतंकवादियों की नाभिकीय हथियारों या व्यापक संहार करने वाले हथियारों तक पहुंच से रोक सकेगा। आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढांचा मजबूत होगा क्योंकि इसके साथ 13 अन्य कानून भी लागू होंगे। उनके अनुसार इस कानून के लागू होने पर आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय जंग में विभिन्न देशों की सत्ताओं में सहयोग को प्रोत्साहन भी मिलेगा। यह कानून पिछले सितम्बर महीने में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में यूनाइटेड नेशन्स ग्लोबल काऊंटर टेररिज्म को अंगीकृत करने के बाद आ रहा है। उसी की रणनीति के तहत दुनिया भर के देशों को आतंकवाद विरोधी इन नये कानून को अनुमोदित करना था जो लगभग पूरा हो गया है। आने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक की यह खास बात भी होगी।

फिर भी हमें अतीत के अनुभवों के प्रति गंभीरता रखनी होगी ताकि नाभिकीय आतंकवाद भी समाप्त हो जाये और नाभिकीय दादागिरी भी। नाभिकीय देशों पर भी लोकतांत्रिक रुप से चलने की विवशता का माहौल बनाया जाये और उन्हें भी कमजोर राष्ट्रों को डराने-धमाकाने से रोका जाये। जब तक ऐसा संभव नहीं होता धरती पर शांति लाने का उद्देश्य सफल नहीं हो पायेगा। बेहतर तो यह होता कि सभी देशों का निरस्त्रीकरण हो, सिर्फ चुनिंदे राष्ट्रों का नहीं। #