हम दो अमूल्य जीवन पहले ही खो चुके हैं। भारत सरकार को वहां रहने वाले भारतीयों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। यह उपयुक्त समय नहीं है यूक्रेन में पढ़ रहे छात्रों की शैक्षणिक निपुणता पर चर्चा करने का। इस संबंध में कुछ मंत्रियों द्वारा की गई टिप्पणियां पूर्णतया असामयिक थीं, जिनसे उनके जख्मों पर नमक डाला गया। यद्यपि ‘‘ऑपरेशन गंगा’’ की पहल की गई लेकिन यह इस गंभीर परिस्थिति के छोर तक को स्पर्श न कर सकी। भारत सरकार हजारों भारतीयों के जीवन और उम्मीदां को प्रभावित करने वाले संकट से निकालने में बुरी तरह असफल रही। सरकार का नेतृत्व करने वालों को समझना चाहिए कि इस तरह के युद्ध एवं विवादों की स्थिति में भाषणबाजी से कोई नतीजा नहीं निकल सकता। सभी संभावनाओं के साथ कूटनीति, व्यवहारिक कौशल और कल्पना का इस्तेमाल अपने ध्येय के लिए करना चाहिए। हमारे बच्चे उस युद्धग्रस्त देश से मदद की गुहार कर रहे हैं। हमारी जान बचाओ-की उनकी चीखों को अधिकतम गंभीरता से सुना जाना चाहिए और इसे सर्वोच्च प्राथमिकता से निपटना चाहिए।

एक बार फिर दुनिया युद्ध के, इस बार यूक्रेन में, त्रासद और अमानवीय रूप को देख रही है। यह अचानक से शुरू नहीं हुआ। युद्ध के बादल कई वर्षों से उमड़ रहे थे, क्योंकि अमेरिका और रूस के बीच विवाद बढ़ रहा था। क्रिमिया संकट और दोनेत्सक एवं लुहांस्क गणराज्यों की घटनाओं ने तनाव को भड़काने का काम किया। वर्तमान में, हालांकि ये रूस अैर यूक्रेन के बीच युद्ध-सा लगता है, यह उतना सीधा मामला नहीं है जैसे समझा जा रहा है। यद्यपि अमेरिका प्रत्यक्ष रूप में नहीं दिख रहा, उनकी भू-राजनीतिक योजनाएं और यूरोप पर वर्चस्व के लालच में यूक्रेन के इर्दगिर्द संकट बढ़ाने में निर्विवाद भूमिका रही है। निःसंकोच, यूक्रेन के खिलाफ पूर्ण युद्ध छेड़ने के लिए रूस में पुतिन प्रशासन की भर्त्सना होनी चाहिए। रूस की आक्रमणकारी सेना रिहायशी इलाकों और अबोध लोगों पर भी बम बरसाने और हमले करने में लगी है। दोनों बड़ी शक्तियों ने इस तथ्य से आंॅखे मॅूंद रखी हैं कि आज दुनिया में कहीं भी किसी भी विवाद का जवाब युद्ध नहीं है।

सोवियत संघ के विखंडन से ही अमरीका के युद्ध सौदागर नाटो को पुनः सक्रिय करने और पूर्व में इसके फैलाव की योजनाएं बना रहे हैं। विश्व शीत युद्धकालीन उनके उपदेश कोरे झूठ थे। सोवियत संघ से लड़ने के नाम पर वे हथियार स्पर्धा को बढ़ा रहे थे। लेकिन वे इस हथियार स्पर्धा को यहां तक कि सोवियत संघ और यूरोप के समाजवादी ब्लॉक के ना रहने पर भी छोड़ने को तैयार नहीं थे। अमेरिका का युद्ध मुख्यालय, पेंटागन दुनिया के विभिन्न हिस्सों में क्षेत्रीय विवाद उपजाने और युद्ध तैयारियों की शोध कर रहा था। सैन्य उद्योग गठबंधन ;मिलेट्री इन्डस्ट्रियल कॉपेलेक्सद्ध व्हाइट हाउस के नीति निर्माण में अपने शक्तिशाली प्रभाव के साथ इस अभ्यास के लिए आतुर था। उनके लिए सर्वोच्च धनवानों के लिए क्षेत्र की संतुष्टि के लिए युद्ध जरूरी है।

अनेक लोगों ने सपने देखे थे कि जैसे ही सोवियत संघ खत्म होगा शीतयुद्ध बंद हो जाएगा। उन नादानों ने सोचा कि अस्त्र-शस्त्र और विनाश में लगने वाले संसाधनों को जीवन और प्रगति के शांतिपूर्ण पुनर्निर्माण की ओर लगाया जाएगा। लेकिन लोभी पूंजी के असीमित मुनाफों के लिए युद्ध एक निश्चित कारक है। उनके नारों को आगे बढ़ाने की कोशिश के पीछे यही कारण था। यदि यूक्रेन नाटों में शामिल होता है तो रूसी सीमाएं असुरक्षित बन जाएंगी। व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूसी अधिकारी अपने-अपने तरीकों से इस संकट को संबोधित कर रहे थे। यूक्रेन के इर्द-गिर्द लंबे समय से विकसित हो रहे विवादों के शांतिपूर्ण समझौते के लिए अमेरिका और रूस ने कभी कोशिश नहीं की। अब यह युद्ध में बदल गया और नादान औरतें एवं आदमी इसका खामियाजा भुगत रहे हैं।

आज की नई दुनिया में, कई हिस्सों में क्षेत्रीय विवाद बढ़ रहे हैं। सभी जगह युद्धरत समूह एक दूसरे के विनाश के लिए अस्त्रों का सहारा ले रहे हैं। जनसंहार के हथियारों का उत्पादन करने वाले, युद्ध और ध्वंस के व्यापारी इन विनाशकारी खेलों से बहुत लाभ कमाते हैं जब भूख और गरीबी अरबों लोगों को पीड़ित कर रही हो तब न्यायसंगत युद्ध जैसी कोई चीज नहीं है। इस बिन्दू पर हम देख सकते हैं कि यूएन अधिक से अधिक असहाय बन रहा है। एक समय था जब लोग शांति के दूत की तरह यूएन की ओर देखते थे। इस नवउदारवादी समय में यूएन एक कमजोर दर्शक बन गया है जो कि केवल कुछ उपदेश दे सकता है जिन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता। ऐसे क्षण में जनमत काफी प्रासंगिक हो गया है। लोग युद्ध के पक्ष में नहीं हैं, वे शांति चाहते हैं। रूस और यूक्रेन को इस युद्ध को बंद करने के लिए बैठकर समझौते पर बात करनी चाहिए, युद्ध जवाब नहीं है। (संवाद)