बोल्शेविक क्रांति के बाद लेनिन ने बहुसांस्कृतिक, बहुनृवंशीय ;मल्टी-एथनिकद्ध सोवियत संघ में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय 'सेल्फ डिटर्मिनेशन' की दृढ़ता से वकालत की थी। सोवियत संघ के संविधान में इस विविधता को मान्यता दी गई और उसमें सोवियत संघ के विभिन्न नृवंशियों के सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व के लिए प्रावधान थे। दूसरे विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी पर सोवियत विजय और विश्व भर में समाजवाद की अपील से वाशिंगटन और लंदन में पूंजीवाद की ताकतें चिंतित हो उठी। पश्चिम के साम्राज्यवादियों को समाजवाद के मुक्तिकारी प्रयाण को रोकने की बड़ी फिक्र हो गई और 1949 में उन्होंने शीत युद्ध के संदर्भ में एक सैन्य गठबंधन का गठन किया जिसका नाम है नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो)। नाटो का मुख्य फोकस सोवियत संघ और उसके समाजवादी सहयोगियों को घेरने की रही है और वह अमरीका की विदेश नीति और रक्षा नीतियों के एक उपकरण के तौर पर काम करता रहा है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद नाटो के अस्तित्व का कारण ही खत्म हो गया। परंतु तब भी वह काम करता रहा और यहां तक कि विस्तार करता रहा। यह 1990 और 1991 में सोवियत नेतृत्व को दिए गए उस भरोसे के विपरीत था जिसमें नाटो के संबंध में कहा गया था कि वह पूर्व की तरफ नहीं बढ़ेगा और रूस की सुरक्षा को खतरा नहीं पैदा करेगा। इस या उस कल्पित सुरक्षा खतरे का बहाना बनाकर नाटो पूर्वी यूरोप में अपना विस्तार करता रहा है और वहां के देशों को नाटो की सदस्यता देने और रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ता रहा है। नाटो के विस्तार से अमरीका के सैन्य-औद्योगिक कॉम्पलेक्स को जबरदस्त फायदा पहुंचा। शुरू में नाटो की सदस्यता में 12 देश शामिल थे परंतु अब यह संख्या बढ़कर 30 हो गई है जिनमें 28 सदस्य देश यूरोप के हैं। नाटो ने रूस को छोड़ कर पूर्व के वार्सा पैक्ट में शामिल अन्य सभी देशों को अपनी सदस्यता दे दी है। नाटो का रूस की सीमा तक विस्तार हो गया है। उसने पोलैंड में दूर तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात कर दी हैं। इससे पता चलता है कि नाटो का नया मकसद यूरोप में अमेरिकी वर्चस्व के एजेंट के तौर पर काम करना और रूस पर चैक रखना है। रूस को नाटो के विस्तार के संबंध में आपत्तियां हैं। यह आपत्तियां सही हैं और रूस का नेतृत्व कम से कम पिछले दो दशकों से इसके बारे में आपत्तियां करता रहा है।
वर्तमान टकराव यूक्रेन के पूर्वी क्षेत्र में रूसीभाषी अल्पसंख्यकों के साथ कथित दुर्व्यवहार और इस क्षेत्र के मामलों मे अमरीका की लगातार दखलन्दाजी के कारण पैदा हुआ है। अमरीका समर्थित ताकतों के विरोध के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को हटाया जाना इसका एक उदाहरण है। पिछले एक दशक में यूक्रेन की सशस्त्र सेनाओं के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किए गए हैं, सैन्य ट्रेनिंग दी गई है और यूक्रेन में अत्याधुनिक शस्त्रास्त्र दिए गए हैं। इसने रूस को भड़काया है। दूसरी तरफ, नाटो के उकसावापूर्ण कामों के प्रति रूस की प्रतिक्रिया गैर-आनुपातिक रही है। अब रूस द्वारा जबरदस्त हमले ने यूक्रेन की संप्रभुता और भू-क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन किया है और यह अंतर्राष्ट्रीय कानून के सरासर खिलाफ है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां पर पूंजीवादी अल्पतंत्र ‘कैपेटलिस्ट ऑलीगार्की’ काबिज हो गया है और रूस एक निरकुंशतावादी देश में तब्दील हो गया है। इस तरह के कुछ संकेत हैं कि रूस की महत्वाकांक्षा एक क्षेत्रीय वर्चस्व वाली ताकत बनने की है और पुतिन ‘‘ग्रेटर रशिया’’ को फिर से बहाल करना चाहते हैं। ऐसी महत्वाकांक्षाएं इस क्षेत्र को और अधिक अस्थिर कर सकती हैं, परंतु निश्चित तौर पर नाटो इसका समाधान नहीं है। नाटो और रूसी अल्पतंत्र (ऑलीगार्की) ने इस क्षेत्र में अशांति पैदा कर दी है। रोजाना अनेक जानें जा रही हैं, संपत्तियां तबाह हो रही हैं। दोनों तरफ मेहनतकश लोग मारे जा रहे हैं जबकि युद्ध उद्योग पैसा कमा रहा है, अतः रूस को यूक्रेन में अपनी सैन्य कार्रवाईयों को बंद करना चाहिए और वार्ता करनी चाहिए। रूस और यूक्रेन के बीच वार्ता का कोई ठोस नतीजा अभी तक नहीं निकला है, परंतु यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि इस विवाद को बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के मेज पर बैठकर वार्ता के जरिये ही हल किया जा सकता है। युद्ध खत्म होना चाहिए और क्षेत्र में शांति होनी चाहिए।
जहां तक भारत की बात है, हमारी मुख्य चिंता अपने नागरिकों को, खासतौर छात्रों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाल कर लाने की है। भारत सरकार ने इस संबंध में समय पर कार्रवाई नहीं की और युद्धरत पक्षां से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया जिसके फलस्वरूप वहां फंसे लोग भयानक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। जो एडवाइजरियां जारी की गई वह स्पष्ट नहीं थी। सरकार की दूरदृष्टि की कमी के कारण खारकिव में भारत के नवीन शेखरप्पा नामक छात्र की दुखद मृत्यु हो गई। यह सब होते हुए भी प्रधानमंत्री बेशर्मी के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस युद्ध से फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
इराक युद्ध के दिनों में सरकारी हवाई सेवा-एयर इंडिया से अपने 1,70,000 से अधिक लोगों को सफलतापूर्वक बाहर निकालकर लाई थी। परंतु अब एयर इंडिया को निजी हाथों को बेच दिया गया है और वह अब इस संकट के समय में भी मुनाफा कमाने की कोशिश में लगी है। भले ही भाजपा के लोग राग अलापते रहें कि भारत विश्व गुरू बनने जा रहा है, परंतु असल बात यह है कि भारत अपनी प्रतिष्ठा को और भूमंडलीय मामलों में अपनी स्टैंडिंग को काफी हद तक खो चुका है। गुटनिरपेक्षता के आधार पर अन्य देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों की कीमत पर मोदी सरकार ने अमरीकी लाइन पर चलने का रास्ता अपनाया। तथापि, भारत को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता कर टकराव के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश करनी चाहिए। परंतु भाजपा और प्रधानमंत्री के लिए तो हरेक चीज एक चुनावी मुद्दा है अतः यह बात दूर की कौड़ी नजर आती है।
युद्ध से कोई समाधान नहीं निकलेगा। युद्ध को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। हम शांति की और युद्ध को खत्म करने की अपील करते हैं अन्यथा वर्तमान स्थिति परमाणु हथियारों के साथ एक विश्वयुद्ध का रूप ले सकती है। (संवाद)
युद्ध बंद करो
वार्ता की जाए
डी. राजा - 2022-03-05 11:28
इस समय यूक्रेन का घटनाक्रम विश्व का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। यूक्रेन के प्रमुख शहरों में रूस की सैन्य कार्रवाई और दोनों तरफ से उत्तेजनापूर्ण बयानों से पता चलता है कि यह स्थिति एक पूर्णस्तरीय युद्ध में बदल सकती है जिसमें युद्ध करने वाले पक्ष युद्ध के मैदान यूक्रेन से बहुत दूरस्थ क्षेत्रों से होंगे। भारत में भी लोग इस युद्ध के बारे में आशंकित हैं। हम एक अन्तर्ग्रथित दुनिया में रह रहे हैं जिसमें इस पैमाने की भू-राजनीतिक ताकतों के बीच टकराव से हम अछूते नहीं रह सकते। अतः यह जरूरी है कि रूस और यूक्रेन के बीच इस झगड़े की तह तक जाएं और तय करें कि हमें क्या पोजीशन अपनानी चाहिए।