अगस्त में, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफअल्वी ने पूर्व प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ की सलाह पर संसद को भंग कर दिया, जिससे आम चुनाव का रास्ता साफ हो गया। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार, आम चुनाव संसद भंग होने के 90 दिनों के भीतर पूरे हो जाने चाहिए। नतीजतन, चुनाव अक्तूबर या नवंबर में होने की उम्मीद थी। हालाँकि, ईसीपी ने कहा कि नयी जनगणना के आलोक में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमनकरने के लिए उसे और समय चाहिए। वर्तमान मेंकार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवर-उल-हक कक्कड़ सरकार के दैनंदिन कार्यों को देख रहे हैं।

नेशनल असेंबली में 336 सदस्य हैं, जिनमें 60 सीटें महिलाओं के लिए और 10 गैर-मुसलमानों के लिए आरक्षित हैं। पंजाब में 173 सीटें, सिंध में 75, खैबरपख्तूनख्वा में 55, बलूचिस्तान में 20 और संघीय राजधानी क्षेत्र में 3, कुल 336 सीटें हैं।

2018 के पाकिस्तान आम चुनावों में, इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को 149 सीटें, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज शरीफ) को 82, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को 54 और मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल को 15 सीटें मिलीं।नेशनल असेंबली में उल्लेखनीय उपस्थिति हासिल करने वाले अन्य राजनीतिक दलों में ग्रैंडडेमोक्रेटिकअलायंस (3), मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (7), पाकिस्तान मुस्लिम लीग - क्यू (5), और बलूचिस्तानअवामी पार्टी (5) शामिल हैं।

इस व्यापक आशंका के बीच कि चुनाव अनिश्चित काल के लिए स्थगित किये जा सकते हैं, ईसीपी की घोषणा से उम्मीद जगी है कि चुनाव वास्तव में होंगे। फिर भी, अभी कुछ भी सुनिश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

एक और उल्लेखनीय घटनाक्रम पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की अक्तूबर में देश लौटने और आगामी चुनावों के लिए पार्टी को एकजुट करने की योजना है। नवाज शरीफ पंजाब से आते हैं, जबकि पीटीआई अध्यक्ष इमरान खान खैबरपख्तूनख्वा से हैं। परंपरागत रूप से पंजाबी नेता पाकिस्तान की राजनीति में दबंग भूमिका निभाते रहे हैं। पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण जातीय और जनजातीय आबादी है, और पंजाब के राजनेताओं के प्रभुत्व वाली राष्ट्रीय राजनीति देश की समग्र राजनीति और अर्थव्यवस्था के साथ अच्छी तरह से मेल नहीं खाती है।

उदाहरण के लिए, बलूचिस्तान के लोग सरकार के हर काम का विरोध कर रहे हैं, जिसमें बेल्ट एंड रोड पहल के तहत चीनी परियोजनाएं भी शामिल हैं। इसी तरह, खैबरपख्तूनख्वा सरकार से मिलने वाले सौतेले व्यवहार के कारण इस्लामी आतंकवाद का केंद्र रहा है। इस क्षेत्र का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा इमरान खान छोटे-मोटे और राजनीति से प्रेरित आरोपों पर कई महीनों से जेल में हैं।

इसलिए, पाकिस्तान को मुख्यधारा की राजनीति के नजरिए से देखना गलत विश्लेषण और निष्कर्षों के खतरों से भरा है। पाकिस्तान इस स्थिति में आ गया है कि उसे अपनी ही पीड़ा और सुंदरता के आलोक में देखने की जरूरत है। बाहरी दुनिया के लिए, पाकिस्तान को कुछ ग्लैमरस लेकिन खोखले पुरुष और महिला राजनेता वाले देश के रूप में देखा जाता है, जबकि लाखों लोग चुनौतीपूर्ण नागरिक और लोकतांत्रिक माहौल में बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित रहते हैं।

इस गंभीर और जटिल वास्तविकता को देखते हुए, पाकिस्तान में चुनाव अनिश्चित और अप्रासंगिक दोनों है। यदि शरीफ खानदान या इमरान खान को छोड़ने वाले लोग सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो गये, तो आम लोगों की स्थिति बेहतर नहीं होगी। देश ढहती अर्थव्यवस्था से लेकर बढ़ते उग्रवाद, जलवायु संकट और कानून-व्यवस्था में गिरावट तक सभी दिशाओं से चुनौतियों का सामना कर रहा है।

जब देश सबसे कमजोर स्थिति में होता है, उसी समय अपनी गोटियों सेंकने वाली निहित शक्तियां उसकी ओर आकर्षित होती हैं। पाकिस्तान बुरी तरह पश्चिमी और एशियाई शक्तियों के चंगुल में फंसा हुआ है। जबकि आईएमएफ चाहता है कि देश एक अरब डॉलर के ऋण की अगली किश्त जारी करने के लिए गरीब समर्थक नीतियों को त्याग दे, चीन धीरे-धीरे महंगी और बेकार परियोजनाओं के माध्यम से अपनी जमीन पर दावा कर रहा है। अरब जगत के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता भी कम हो गयी है क्योंकि देश को बहरीन या कतर के बजाय अगला अफगानिस्तान बनना तय लग रहा है। पाकिस्तान पूरी तरह अपना मनोबल खो चुका है।

आगामी चुनाव, चुनावों से ज्यादा पाकिस्तान की नियति पर विचार करने का एक अवसर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अगली सरकार कौन सी पार्टी बनायेगी, क्योंकिलोग इस समय केवल खोखले शब्दों की ही उम्मीद कर सकते हैं। उन्हें अपने जीवन में कोई राहत नहीं मिलने वाली है, जबकि देश की प्रतिष्ठा उत्तरोत्तर धूमिल होती जायेगी।

पाकिस्तानीआजपाकिस्तान के बाहर चमक रहे हैं। वे इस बात की याद दिलाते हैं कि ऊंचे आदर्श और कोमल सपने कैसे गलत हो सकते हैं। (संवाद)