ओबामा द्वारा सत्ता संभाले 16 महीने हो गए हैं, लेकिन वे अभी भी घरेलू, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय उलझनों में उलझे हुए हैं। अफगानिस्तान और इराक अभी भी समस्या बनी हुई है और ओगामा ने कह रखा है कि जुलाई, 2011 से अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी शुरू हो जाएगी। उनके सामने कोई आसान विकल्प नहीं हैं। या तो वे सेना की वापसी का काम बहुत ही धीमा रखें अथवा अफगानिस्तान को एक बार फिर तालिबान शासन में जाने के लिए छोड़ दें।

सफल राष्ट्रपति का तगमा पाने के लिए ओबामा को अपनी अफ-पाक नीति में सफल होना ही पड़ेगा। उन्हें शांति के लिए मिला नोबेल पुरस्कार इसकी याद दिलाता रहेगा। अमेरिकी कांग्रेस अब अफगानिस्तान में सेना भेजने के लिए ज्यादा पैसे नहीं देना चाहता है। अफगानिस्तान में अमेरिका के 92 हजार सैनिक हैं, जबकि इराक में 85 हजार। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका का खर्च 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह सवाल पुछे जा रहे हैं कि क्या इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना विजयी हो भी पाएगी? अनिश्चिितता के कारण अब इन दोनों देशों में अमेरिकी युद्ध के प्रति लोगों का समर्थन कम होता जा रहा है।

अमेरिका अफगानिस्तान में अपनी सेना की संख्या तो बढ़ा रहा हैख् लेकिन अभी भी अनेक महत्चपूर्ण ठिकाने उसकी पहुच के बाहर हैं। राष्ट्रपति करजई ने तो एक बार धमकी दे डाली कि वे तालिबान में शामिल हो जाएंगे। उन्होंने यह धमकी अमेरिका द्वारा अच्छी सरकार देने के बढ़ते दबावों के बीच दी। दरइसल चुनाव के बाद करजई कमजोर पड़ गए हैं।

अमेरिका के साथ भारत और पाकिस्तान के संबंधों में पाकिस्तान का हाथ भारत की अपेक्षा ऊंचा है। अमेरिका ने भारत से साफ कह दिया है कि उसे अफगानिस्तान में सफल होने के लिए पाकिस्तान की सहायता की सख्त जरूरत है। उसे अल कायदा के खिलाफ भी पाकिस्तान की सहायता चाहिए। यही कारण है कि अमेरिका भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत चाहता है और उसके कारण ही दोनों देश आपस में बातचीत कर रहे हैं। अमेरिका को लगता है कि पाकिस्तान अपनी अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों पर तभी ज्यादा ध्यान दे सकता है, जब कश्मीर से सटे इलाकों में उसे भारत की तरफ से कोई खतरा महसूस नहीे हो।

अफगानिस्तान में शांति हो, यह भारत के हित में हैं। पाकिस्तान भी यही चाहेगा कि उसके पड़ोसी मुल्क में शांति हो। भारत अफगानिस्तान के पुनर्निमाण में योगदान भी कर रहा है। वह वहां स्कूल, सड़क और अस्पतालों का निर्माण कर रहा है। अमेरिका भी अफगानिस्तान में भारत के योगदान को स्वीकार करता हैख् लेकिन पाकिस्तान को यह मुजूर नहीं है कि भारत किसी तरह अफगानिस्तान दखलंदाजी करे। वह भारत पर बलोचिस्तान में विद्रोह फेलाने का आरोप भी लगाता रहता है।

अफगानिस्तान को लेकर भारत की अपन चिंताएं हैं। वह अच्छे तालिबान और खराब तालिबान के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता। गौरतलब है कि अमेरिका ने अच्छे और खराब तालिबान की चर्चा शुरू कर दी है और वह कथित रूप से अच्छे तालिबान से बातचीत करना चाहता हैख् लेकिन भारत इसे उचित नहीं मानता। वह इस बात को समझता है कि अफगानिस्तान की स्थिति का संबंध भारत से है। ओबामा प्रशासन अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान की चिंताओं में संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। (संवाद)