2008 में वाल स्ट्रीट के निवेशक बैंकों के पतन के बाद पूंजीवादी व्यवस्था की कमजोरियां सबके सामने आ गई हैं। शोधकर्ता और विश्लेषक उन कमजोरियों पर शोध पर शोध किए जा रहे हैं और रोज उनसे जुड़े नए नए तथ्य उजागर किए जा रहे हैं। उन शोघों का ताजा शिकार क्रेडिट रेटिंग कंपनियां, स्टैंडर्ड एंड पूअर्स और मूडीज बनी हैं। कुछ समय पहले तक इन दोनों कंपनियों की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता था। इन दोनों कंपनियों का काम दुनिया के अन्य देशों की क्रेडिट रेटिंग करना भी होता है और उनकी रेटिंग के आधार पर किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार में स्टैटस तय होता है और उसी स्टैटस के मुताबिक उन्हें अंतरराष्ट्रीय लोन मिलते हैं। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी उन दोनों एजेंसियों द्वारा जारी की गई रेटिंग पर कभी सवालिया निशान नहीं लगाते। लेकिन अब चह सबकुछ शायद इतिहास बनता जा रहा है। अमेरिका की जांच एजेंसियां इन दोनों कंपनियों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा रही हैं। उनकी स्वतंत्रता और उनकी निष्प्क्षता पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सच तो यह है कि अमेरिका का कॉर्पोरेट जगत आज जिस तरह की विश्वसनीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है, वह अभूतपूर्व है।
बर्कशायर हाथवे के मालिक दुनिया के सबसे धनी आदमी हैं। उनकी उम्र 80 साल से भी अधिक हो गई है। अब उनका भी मानना है कि मूडीज का मॉडल फूलप्रूफ नहीं है। वे मूडीज कॉपोरेशन में अपना स्टेक पिछले कई महीनों से लगातार कम कर रहे हैं। यूनाइटेड स्टेट्स फिनांसियल क्राइसिस इन्कवायरी कमीशन हाउसिंग मोर्गेज की विफलता में मूडीज और स्टैंडर्ड एंड पूअर्स की भूमिका की जांच कर रहे हैं। गौरतलब है कि इन एजेंसियों की क्रेडिट रेटिंग की आड़ में ही हाउसिंग मोर्गज और सबमौर्गेज का धंधा अमेरिका में परवान चढ़ रहा था। और उसी सेक्टर में संकट शुरू होने के बाद अमेरिका के निवेश बैंक एक के बाद एक फेल होने लगे थे। अब उन दोनों कंपनियों के अंदर चल रही जालसाजी के मामले सामने आने लगे हैं और पता चलने लगा है कि ये दोनांे कंपनियां किस तरह से क्रेडिट रेटिंग के अपने काम को अंजाम दे रही है।
इस तरह के रहस्यों का उद्घाटन जब कभी भी होता है कार्पोरेट जगत की विश्वसनीयता का ग्राफ थोड़ा और नीचे चला जाता है। (संवाद)
अमेरिकी कॉर्पोरेट के सामने विश्वसनीयता का संकट
विशेषज्ञ चाहते हैं ज्यादा सरकारी हस्तक्षेप
नन्तु बनर्जी - 2010-07-12 13:04
वाशिंगटनः अमेरिका में पूंजीवादी व्यवस्था कभी भी लोगों की आलोचना का इतना बड़ा शिकार नहीं थी, जितना वह आज है। अमेरिका तो मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था का स्वर्ग रहा है। आज ओबामा प्रशासन अपने देश के शिक्षाविदों, आर्थिक एवं राजनैतिक चिंतको के भारी दबाव का सामना कर रहे हैं और उनपर दबाव है कि राज्य आर्थिक मामलों में ज्यादा से ज्यादा हस्तक्षेप करे ताकि सटौरिए, लालची बैंकर लेखापाल और कॉर्पारेट एक्जक्यूटिव्स पर लगाम लग सके।