राज्य में 97,806 आंगनवाड़ी और मिनी आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं, जिनके जरिए 61.58 लाख लाभार्थियों को सेवाएं दी जा रही हैं। यह नेटवर्क निश्चित रूप से व्यापक है। लेकिन जब इसकी तुलना पिछले वर्ष के 69.87 लाख लाभार्थियों से करते हैं, तो लगभग 8.29 लाख की कमी दिखाई देती है। खासकर 3 से 6 वर्ष आयुवर्ग में गिरावट अधिक है। यह केवल संख्या का अंतर नहीं है। यह पंजीकरण प्रक्रिया, पात्रता में बदलाव, डेटा अपडेट या फिर वास्तविक कवरेज में कमी—किसी भी कारण की ओर इशारा कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वेक्षण इस गिरावट का स्पष्ट कारण नहीं बताता, जिससे विश्लेषण और भी जरूरी हो जाता है।
बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के आंकड़े एक अलग परत जोड़ते हैं। अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 के बीच 83.77 लाख बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। यह संख्या आईसीडीएस में पंजीकृत बच्चों से भीअधिक है, जिससे यह संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच केवल आंगनवाड़ी तक सीमित नहीं, बल्कि स्कूलों और अन्य माध्यमों तक भी फैली हुई है। लेकिन दूसरी ओर, जांचे गए बच्चों में से 23.45 लाख को विशेष जांच या उपचार की जरूरत पड़ी और 20.24 लाख बच्चों का इलाज किया गया। लगभग 26,950 बच्चों की सर्जरी भी कराई गई। यानी करीब 28 प्रतिशत बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता पाई गई। इससे साफ है कि स्क्रीनिंग व्यवस्था सक्रिय है, लेकिन बच्चों की स्वास्थ्य चुनौतियां अभी भी व्यापक हैं।
नवजात स्वास्थ्य के क्षेत्र में 62 विशेष नवजात शिशु चिकित्सा इकाइयां और 200 नवजात स्थिरीकरण इकाइयां कार्यरत हैं। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच 93,047 गंभीर या कम वजन वाले नवजातों का उपचार किया गया। यह संस्थागत व्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि नवजात स्तर पर जोखिम की स्थिति अभी भी बड़ी संख्या में मौजूद है।
बालिका सशक्तीकरण के संदर्भ में लाड़ली लक्ष्मी योजना और आवासीय शिक्षा मॉडल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के माध्यम से कक्षा 6-12 में 100 प्रतिशत प्रगति और कक्षा 9-12 में 99 प्रतिशत प्रगति दर्ज की गई है, जो लगभग सार्वभौमिक कवरेज का संकेत है। इसके अलावा लगभग 18 लाख बालिकाओं को सैनेटरी नैपकिन के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सहायता दी गई है। यह कदम केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यालय में नियमित उपस्थिति और गरिमा से भी जुड़ा है।
फिर भी शिक्षा के व्यापक संकेतक मिश्रित तस्वीर दिखाते हैं। 2023-24 में सकल नामांकन अनुपात प्राथमिक स्तर पर 80.2 प्रतिशत, माध्यमिक स्तर पर 67 प्रतिशत और उच्च माध्यमिक स्तर पर 43.9 प्रतिशत रहा। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे कक्षाएं आगे बढ़ती हैं, नामांकन घटता जाता है। यही वह जगह है जहां लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं की असली परीक्षा होती है। क्या वे माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं को पढ़ाई में बनाए रखने मेंसफल हो रही हैं? वर्ष 2025-26 में 59.13 लाख विद्यार्थियों का पंजीकरण दर्ज होना सकारात्मक संकेत है, लेकिन वास्तविक उपस्थिति और सीखने के परिणामों पर भी समान ध्यान देना जरूरी है।
स्वास्थ्य के दीर्घकालिक संकेतकों पर नजर डालें तो सुधार दिखाई देता है। मातृ मृत्यु दर 2001-03 में 379 थी, जो 2021-23 में घटकर 142 हो गई है। यह उल्लेखनीय प्रगति है। फिर भी 2047 तक इसे 20 से कम करने का लक्ष्य बताता है कि अभी भी काफी दूरी तय करनी बाकी है। शिशु मृत्यु दर की वर्तमान आधार रेखा 41 प्रति हजार जीवित जन्म है, जिसे 5 से कम करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे साफ है कि सुधार हुआ है, लेकिन गति को और तेज करना होगा।
कुपोषण के अद्यतन वार्षिक प्रतिशत का स्पष्ट तुलनात्मक डेटा दस्तावेज़ में उपलब्ध नहीं है। यही एक महत्वपूर्ण डेटा अंतर है, जो विश्लेषण को सीमित करता है। यदि लाभार्थियों की संख्यामें कमी के साथ पोषण स्तर में स्पष्ट सुधार के आंकड़े भी सामने आते, तो स्थिति को अधिक सकारात्मक रूप में देखा जा सकता था। लेकिन ऐसे प्रत्यक्ष तुलनात्मक आंकड़ों के अभाव में सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
कुल मिलाकर आर्थिक सर्वेक्षण यह दर्शाता है कि राज्य ने बाल विकास, स्वास्थ्य और बालिका शिक्षा के क्षेत्र में ढांचागत मजबूती लाने का प्रयास किया है। आंगनवाड़ी नेटवर्क, स्वास्थ्य परीक्षण अभियान, नवजात इकाइयां और बालिका सशक्तीकरण योजनाएं सक्रिय हैं। लेकिन लाभार्थियों की संख्या में गिरावट, बड़ी संख्या में स्वास्थ्य हस्तक्षेप की जरूरत और उच्च कक्षाओं में घटता नामांकन यह संकेत देते हैं कि अब ध्यान संरचना से आगे बढ़कर गुणवत्ता, निरंतरता और वास्तविक परिणामों पर केंद्रित होना चाहिए। आखिरकार आर्थिक विकास की असली मजबूती इसी से तय होगी कि प्रदेश में बच्चे कितने स्वस्थ, पोषित और शिक्षित हैं। (संवाद)
मध्यप्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 : बच्चों के विकास के सवाल
बाल विकास और संरक्षण : आंकड़ों के बीच छिपे संकेत
राजु कुमार - 2026-02-17 13:18 UTC
आर्थिक सर्वेक्षण किसी भी राज्य की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का आईना होता है। यह सिर्फ विकास दर, निवेश और उत्पादन के आंकड़े नहीं देता, बल्कि यह भी बताता है कि राज्य का नजरिया क्या है और वह अपने भविष्य को किस दिशा में ले जाना चाहता है। कृषि, उद्योग और अधोसंरचना के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र को कितना महत्व दिया जा रहा है, यह भी इसी दस्तावेज़ से समझ आता है। मध्यप्रदेश का आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 सामने आ चुका है। यदि सामाजिक विकास के दृष्टिकोण से बाल विकास एवं संरक्षण के हिस्से को ध्यान से देखें, तो साफ दिखता है कि ढांचे का विस्तार हुआ है, लेकिन कवरेज, परिणाम और आंकड़ों की प्रवृत्तियों को लेकर कुछ गंभीर सवाल अब भी मौजूद हैं।