भारत में नदियों को आपस में जोड़ने के प्रस्ताव का एक लंबा इतिहास है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान, 19वीं सदी के इंजीनियर आर्थर कॉटन दक्षिण-पूर्वी भारत (अब आंध्र प्रदेश और ओडिशा ) में पानी की कमी और सूखे की समस्या से निपटने के लिए प्रमुख भारतीय नदियों को आपस में जोड़ने की योजना प्रस्तावित की थी। स्वतंत्रता के बाद 1970 में, बांध डिज़ाइनर और पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ. के.एल. राव ने राष्ट्रीय जल ग्रिड का प्रस्ताव रखा। वे दक्षिण में पानी की गंभीर कमी और उत्तर में हर साल आने वाली बाढ़ से चिंतित थे । 1980 के बाद नदी जोड़ने की परियोजनाओं केा लेकर कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं गयी हालांकि, परियोजनाओं को आगे नहीं बढ़ाया गया। नदी अंतर्संबंध का विचार 1999 में पुनर्जीवित हुआ, जब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन ने भारत सरकार का गठन किया। जिस पर आजतक कार्य चल रहा है।

बीच में कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सत्ता में आयी तो उसने परियोजना की अवधारणा और योजनाओं के प्रति अपने विरोध को फिर से जीवित कर दिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अभियान चलाया कि यह परियोजना लागत, संभावित पर्यावरणीय और पारिस्थितिक क्षति, जल स्तर और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से जुड़े खतरों के संदर्भ में विनाशकारी हो सकती है। भारत की केंद्र सरकार ने 2005 से 2013 तक कई समितियों का गठन किया, कई रिपोर्टों को खारिज कर दिया। फरवरी 2012 में, वर्ष 2002 में दायर एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए, सर्वाेच्च न्यायालय ने नदियों को जोड़ने की परियोजना के कार्यान्वयन के लिए कोई निर्देश देने से इनकार कर दिया और कहा कि इसमें नीतिगत निर्णय शामिल हैं जो राज्य और केंद्र सरकारों की विधायी क्षमता का हिस्सा हैं।

नदियों को आपस में जोड़ने वाली प्रत्येक परियोजना के लिए व्यवहार्यता रिपोर्ट (एफआर) और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करते समय पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) किया जाता है, ताकि नदी तटवर्ती समुदायों सहित सभी समुदायों पर पड़ने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जा सके। प्रचलित कानूनों के अनुसार आवश्यक वैधानिक पर्यावरणीय और वन्यजीव संबंधी स्वीकृतियां प्राप्त की जाती हैं। सहभागी राज्यों द्वारा कार्यान्वयन समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद, केंद्रीय सहायता के मूल्यांकन और विचार के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं। केंद्र और राज्यों के बीच लागत साझाकरण व्यवस्था एक समान नहीं है और प्रत्येक परियोजना के लिए अलग-अलग निर्धारित की जाती है।

फिलहाल,राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (एनपीपी) के अंतर्गत चिन्हित नदियों को आपस में जोड़ने वाली (आईएलआर) 30 परियोजनाओं में से 26 लिंक की व्यवहार्यता रिपोर्ट (एफआर) और 13 लिंक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पूर्ण कर ली गई हैं। लेकिन एनपीपी के अंतर्गत कोई भी नदियों को आपस में जोड़ने वाली परियोजना जम्मू और कश्मीर संघ राज्य क्षेत्र से संबंधित नहीं है। देश में पिछले पांच वर्षों में स्वीकृत की गई नदियों को आपस में जोड़ने वाली परियोजनाओं में गोदावरी-कृष्णा नदी लिंक, कृष्णा (अलमट्टी)-पेन्नार लिंक, बेदती-वरदा लिंक, नेत्रावती-हेमावती लिंक और केन-बेतवा लिंक शामिल हैं।केन-बेतवा लिंक परियोजना एकमात्र प्राथमिकता वाली परियोजना है जो कार्यान्वयन चरण में प्रवेश कर चुकी है।

हमारे देश में दो प्रकार की नदियां है हिमालयी और प्रायद्वीपीय। हिमालयी नदियों के विकास में भारत और नेपाल में मुख्य गंगा और ब्रह्मपुत्र तथा उनकी प्रमुख सहायक नदियों पर भंडारण जलाशयों के निर्माण के साथ-साथ गंगा की पूर्वी सहायक नदियों के अतिरिक्त जल प्रवाह को पश्चिम की ओर स्थानांतरित करने के लिए अंतर्संबंधी नहर प्रणाली का निर्माण और मुख्य ब्रह्मपुत्र को गंगा से जोड़ने की परिकल्पना की गई है।यह योजना न केवल गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन के राज्यों को, बल्कि नेपाल और बांग्लादेश को भी लाभ पहुंचाएगी, बशर्ते नदी प्रवाह प्रबंधन संधियों पर सफलतापूर्वक बातचीत हो जाए।

हिमालयी घटक में जिन नदियों को जोड़ा जाना हैं वे हैं-घाघरा-यमुना लिंक (व्यवहार्यता अध्ययन पूरा), सरदा-यमुना संपर्क मार्ग (व्यवहार्यता अध्ययन पूर्ण), यमुना-राजस्थान संपर्क, राजस्थान-साबरमती लिंक, कोसी-घाघरा लिंक, कोसी-मेची लिंक, मानस-संकोश-तिस्ता-गंगा लिंक, जोगीघोपा-तिस्ता-फरक्का लिंक, गंगा-दामोदर-सुवर्णरेखा लिंक, सुबर्णरेखा-महानदी लिंक, फरक्का-सुंदरबन लिंक, गंडक-गंगा लिंक, और चुनार-सोने बैराज लिंक। सोन बांध गंगा की दक्षिणी सहायक नदियों को जोड़ता है।

प्रायद्वीपीय घटक में जिन नदियों को जोड़ा जाना हैं वे हैं - महानदी (मणिभद्र)-गोदावरी (दौलीस्वरम) लिंक, (इंचमपल्ली) - कृष्णा (पुलीचिंतला) लिंक, गोदावरी (इंचमपल्ली) - कृष्णा (नागार्जुनसागर), लिंगोदावरी (पोलावरम) - कृष्णा (विजयवाड़ा) लिंक, कृष्णा (अलमाटी) - पेन्नार लिंक, कृष्णा (श्रीशैलम) - पेन्नार लिंक, कृष्णा (नागार्जुनसागर) - पेन्नार (सोमासिला) लिंक, पेन्नार (सोमासिला) - कावेरी (ग्रैंड एनीकट) लिंक, केन-बेतवा लिंक, पारबती-कालीसिंध-चंबल लिंक, पार्वती-कुनो-सिंध लिंक पार्वती, पार-तापी-नर्मदा लिंक, दमनगंगा - पिंजल लिंक, बेदती - वर्दा लिंक, नेत्रावती - हेमवती लिंक, और पम्बा - अचानकोविल - वैप्पार लिंक।

कुल मिला कर हम यह कह सकते हैं कि भारत में नदियों को जोड़ने की योजना के तहत केन-बेतवा लिंक परियोजना कार्यान्वयन के चरण में है, जो राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की पहली प्राथमिकता वाली परियोजना है। इसके अलावा, 30 में से 13 परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पूरी हो चुकी है।