सरकार ने यह मंशा जाहिर की है कि विकास परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराते हुए किसानों को आर्थिक रूप से सुरक्षित किया जाए। लंबे समय से यह शिकायत रही है कि भूमि अधिग्रहण के दौरान किसानों को वास्तविक बाजार मूल्य नहीं मिल पाता, या भुगतान में अत्यधिक देरी होती है। ऐसे में चार गुना मुआवजे का प्रावधान एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। लेकिन नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह लाभ बिना देरी और बिना जटिल प्रक्रियाओं में उलझाए किसानों तक पहुंचता है या नहीं।
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि राजस्व अभिलेख, माप-जोख और आपत्तियों की प्रक्रिया में मामले लंबित हो जाते हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि जमीन का वास्तविक रकबा कम दर्ज कर दिया जाता है या मूल्यांकन पारदर्शी नहीं होता। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो अधिक मुआवजे की घोषणा का प्रभाव सीमित रह सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि पूरी प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाए।

अन्य राज्यों के अनुभव इस संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। उदाहरण के लिएहरियाणामें भूमि अधिग्रहण के कई मामलों में विकसित भूमि का एक हिस्सा प्रभावित किसानों को वापस देने की व्यवस्था की गई है, जिसे “प्लॉट रिटर्न” मॉडल के रूप में जाना जाता है, हालांकि यह सभी परियोजनाओं में एक समान रूप से लागू नहीं होता।गुजरातमें औद्योगिक और शहरी विकास के लिए टाउन प्लानिंग स्कीम आधारित भूमि पुनर्गठन मॉडल लंबे समय से अपनाया गया है, जिसमें जमीन का एक हिस्सा बुनियादी ढांचे के लिए लिया जाता है और शेष विकसित भूमि मालिकों को वापस दी जाती है। इसी तरहआंध्र प्रदेशकी अमरावती परियोजना में भूमि पूलिंग मॉडल अपनाया गया, जहां किसानों को नकद मुआवजे के साथ-साथ विकसित प्लॉट और वार्षिक अनुदान देने का प्रावधान किया गया। ये उदाहरण बताते हैं कि केवल नकद मुआवजा ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास और आय के विकल्प भी महत्वपूर्ण हैं।

मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह विचार विशेष रूप से प्रासंगिक है कि “जमीन के बदले जमीन” की नीति को प्राथमिकता दी जाए। कई विशेषज्ञ समितियों और रिपोर्टों में यह सुझाव दिया गया है कि जहां संभव हो, प्रभावित किसानों को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जाए, ताकि उनकी आजीविका बनी रहे। यदि नई नीति में इस दिशा में ठोस प्रावधान शामिल किए जाते हैं, तो इसका प्रभाव अधिक स्थायी हो सकता है। चूंकि मध्यप्रदेश में आदिवासी एवं छोटे जोत के किसान अधिक हैं और उनकी पूरी आजीविका खेती पर निर्भर है, तो यह एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिक मुआवजे की घोषणा से बाजार में कुछ अनपेक्षित स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। आशंका यह जताई जाती है कि कुछ बड़े निवेशक किसानों से कम कीमत पर जमीन खरीदकर बाद में अधिग्रहण की स्थिति में अधिक मुआवजा प्राप्त कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो इसका वास्तविक लाभ किसानों के बजाय बिचौलियों को मिलेगा। इसलिए इस प्रकार के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट और सख्त निगरानी व्यवस्था आवश्यक है।

इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि विकास की योजना बनाते समय “कम से कम भूमि अधिग्रहण” की नीति को अपनाया जाए। यदि परियोजनाओं को इस प्रकार तैयार किया जाए कि कम भूमि में कार्य संभव हो, तो किसानों पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होगा।

मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यह अभी एक घोषणा है, जिसके परिणाम आने बाकी हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह नीति किसानों के लिए वास्तविक सुरक्षा कवच बनती है या फिर केवल एक आश्वासन तक सीमित रह जाती है। (संवाद)