सुनवाई के दौरान बेंच ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में “एक भी बिल्कुल निष्पक्ष व्यक्ति” की गैरमौजूदगी की ओर इशारा किया। कमेटी में कैबिनेट मंत्री की मौजूदगी पर भी बेंच ने सवाल उठाया और कहा कि ऐसे मंत्री से प्रधानमंत्री की बात न मानने की उम्मीद नहीं की जा सकती, और पूछा कि क्या कमेटी में विपक्ष के नेता की मौजूदगी सिर्फ “दिखावटी” है। चूंकि मुख्य और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा 2:1 को बहुमत से असरदार तरीके से की जा सकती है, तो चुनाव आयुक्तों की “आज़ादी का यह दिखावा क्यों?”

बेंच ने कहा कि अगर भारत के मुख्य न्यायाधीश सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र प्रक्रिया क्यों नहीं अपनायी जा सकती, जो ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि इसका सीधा संबंध “लोकतंत्र और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को बनाए रखने” से है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ईसीआई को “न सिर्फ़ निष्पक्ष होना चाहिए बल्कि अपने काम में निष्पक्ष दिखना भी चाहिए।”

यह ध्यान देने वाली बात है कि पहले मुख्य न्यायाधीश चयन समिति का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन मोदी सरकार ने सीजेआई को इस कमेटी से हटा दिया। मौजूदा ढांचे के तहत, सरकार “अपनी पसंद के व्यक्ति” को नियुक्त कर सकती है। इसलिए मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां जनता को भरोसेमंद नहीं लगतीं।

बेंच के इस टिप्पणी का राजनीतिक महत्व है क्योंकि इसने ईसीआई पर कार्यपालिका के असर, भेदभाव दिखने, और क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए संस्थागत सुरक्षा को कमज़ोर किया जा रहा है, इस बारे में गंभीर न्यायिक चिंता का संकेत दिया है। सर्वोच्च न्यायालय का तर्क इस प्रकरण को सीधे चुनाव की निष्पक्षता, जनता के भरोसे और संवैधानिक लोकतंत्र से जोड़ता है। एक चुनाव आयोग जो अपनी नियुक्ति के लिए कार्यपालिका पर निर्भर है, उसे अपनी संवैधानिक विश्वसनीयता खोने का खतरा है, खासकर तब जब सत्तारूढ़ पार्टी खुद ईसीआई की देखरेख में चुनाव लड़ती है।

हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल चुनाव ने चुनाव और नियुक्तियों के बीच सीधा संबंध दिखाया है। एसआईआर के लिए विशेष पर्यवेक्षक और राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी कथित तौर पर भाजपा के प्रति लॉयल रहे और पार्टी को जीतने में मदद की, और जब भाजपा जीती, तो उनको नई राज्य सरकार का सलाहकार और मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। भाजपा द्वारा 2023 के नए कानून के तहत नियुक्त ईसीआई ने पर्यवेक्षक और मुख्य चुनाव अधिकारी दोनों को नियुक्त किया था।

राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से दिखाया था कि कैसे कर्नाटक और हरियाणा में भाजपा के पक्ष में राज्य के चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए दूसरे राज्यों के वोटरों को जोड़कर मतदाता सूची में हेरफेर किया गया था। मतदाताओं को कानून के आधार पर जोड़ा गया था। इस खुलासे के बाद, भाजपा के ईशारे पर ईसीआई ने बिहार में एसआईआर शुरू किया, और मतदाता सूची की सफाई के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाये गये। सर्वोच्च न्यायालय ने लाखों मतदाताओं को सूची में शामिल करवाने के लिए दखल दिया, लेकिन अनेक मतदाता सूची से बाहर रह गए और वोट नहीं दे सके। इससे भाजपा को बिहार और हाल ही में पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने में मदद मिली। पश्चिम बंगाल के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव परिणाम से परेशान टीएमसी को अलग केस फाइल करने को कहा है। ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय एसआईआर के तहत केस की भी सुनवाई कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई आखिरी फैसला नहीं आया है।

इस तरह भाजपा चुनाव जीतती जा रही है, और सर्वोच्च न्यायालय अभी भी केस की सुनवाई ही कर रहा है। यह एक सामाजिक राजनीतिक चिंता है जो सर्वोच्च न्यायालय के दायरे से बाहर है, क्योंकि इसके चुनी हुई सरकार की स्थिति पर फैसला करने की संभावना नहीं है, भले ही बाहर किए गए वोटरों के नाम आखिरकार वोटर लिस्ट में शामिल हो जाएं।

हम ऐसा पूर्व के उदाहरणों के आधार पर कह सकते हैं, जिनमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वाला मोदी सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को गैर-संवैधानिक पाया जाना भी शामिल है। लेकिन उन चुनावों की स्थिति पर कुछ फैसला नहीं किया जो इस स्कीम द्वारा गैर-संवैधानिक रूप से इकट्ठा किए गए पैसे से लड़े गए थे। इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम मोदी सरकार ने 2018 में शुरू की थी, और उसके बाद हर चुनाव इसी गैर-कानूनी पैसे से लड़ा गया। विडंबना है कि कानूनी होने की धारणा के तहत गैरसंवैधानिक रूप से धन इकट्ठा किया गया था।

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी काल के दौरान अपने कई फ़ैसलों और टिप्पणियों में उन तौर-तरीक़ों पर चिंता जताई है, जिनके बारे में उसने कहा कि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक सिद्धांत को कमज़ोर कर सकते हैं। 2024 के चुनावी बॉन्ड योजना पर दिए गए फ़ैसले में कोर्ट ने माना कि गुमनाम राजनीतिक फंडिंग ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों के 'सूचना के अधिकार' का उल्लंघन किया; असीमित कॉर्पोरेट फंडिंग ने चुनावी लोकतंत्र को विकृत किया; और इस योजना ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांत का उल्लंघन किया।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि असीमित चंदे की अनुमति देना—जिसमें 'मुखौटा कंपनियां’ भी शामिल हैं—कॉर्पोरेट घरानों और सत्ताधारी दलों के बीच आपसी लेन-देन वाली व्यवस्थाओं की संभावना पैदा करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस योजना ने राजनीति और चुनावों पर कॉर्पोरेट घरानों के "असीमित प्रभाव" को संभव बनाया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संभावना तो असल में तभी समाप्त हो गई थी, जब हम इस बात पर गौर करते हैं कि चुनावी मुक़ाबले संरचनात्मक रूप से कितने असमान हो गए हैं। मोदी सरकार ने चुनावों के लिए 'समान अवसर' देने से इनकार कर दिया है; और चुनाव आयोग इस पर कुछ भी नहीं कर रहा है। मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगे हैं कि उसने चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान विपक्षी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के ख़िलाफ़ केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया, जिसका एकमात्र उद्देश्य उनके राजनीतिक अभियानों में बाधा डालना था। मीडिया और पैसे तक पहुंच के मामले में भी भारी असमानता देखने को मिली है। सरकार पर सरकारी मीडिया और प्रशासन का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया गया है।

इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए, भारत को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के मामले में ईसीआई की निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा फिर से बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए। हम आलोचकों, विपक्षी दलों, पूर्व चुनाव आयुक्तों, संवैधानिक विशेषज्ञों और आम लोगों के उन दावों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, जिनमें यह कहा गया है कि ईसीआई अब मोदी सरकार के साथ ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ा हुआ नज़र आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियां इस बात का संकेत देती हैं कि ईसीआई की स्वतंत्रता और स्वायत्तता से समझौता किया गया है। (संवाद)