वर्ष 2022-23 में मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग के 274 उच्चतर विद्यालयों और जनजातीय कार्य विभाग के 95विद्यालयोंको सीएम राइज स्कूलोंके रूप में विकसितकरने का निर्णय लिया गया था। साल 2025 में राज्य सरकार ने सीएम राइज स्कूलों का नाम बदलकर सांदीपनि विद्यालय कर दिया। इन विद्यालयों की मूल अवधारणा वही रही, लेकिन उन्हें नए नाम के साथ नई पहचान दी गई। वर्तमान में इन विद्यालयों में केजी से लेकर कक्षा 12वीं तक की शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।

इन विद्यालयों की सबसे बड़ी विशेषता उन पर किया गया अपेक्षाकृत बड़ा निवेश है। वर्षों से सरकारी स्कूलों को लेकर सबसे बड़ी शिकायत बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर रही है। कई स्कूलों में भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान और पर्याप्त कक्षाओं जैसी सुविधाएं लंबे समय तक चुनौती बनी रहीं। सांदीपनि विद्यालय मॉडल में इन्हीं कमियों को दूर करने पर विशेष जोर दिया गया है। स्मार्ट कक्षाओं, विज्ञान एवं कंप्यूटर प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, खेल सुविधाओं, कला एवं संगीत गतिविधियों तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के लिए अलग व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया गया है। अनेक विद्यालयों के लिए नए भवन बनाए जा रहे हैं, जबकि कई भवन उपयोग में भी आ चुके हैं।

इन स्कूलों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इन्हें केवल पारंपरिक पढ़ाई तक सीमित नहीं रखा गया। नई शिक्षा नीति के अनुरूप विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर जोर देने की बात की गई है। खेल, कला, संगीत, व्यावसायिक शिक्षा, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जैसे पहलुओं को भी विद्यालयी जीवन का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है। कई विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए परिवहन सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है, जिससे दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों की पहुंच बेहतर स्कूलों तक बन सके।

बेहतर सुविधाओं और अपेक्षाकृत व्यवस्थित प्रबंधन वाले सरकारी विद्यालयोंका ढांचा तैयार होने पर इनके प्रति पालकों का भरोसा बढ़ना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से सांदीपनि विद्यालयों की अवधारणासरकारी विद्यालयों को लेकर बनी नकारात्मक छवि को चुनौती देने की कोशिश है।पिछले साल महू, देवास और नरसिंहपुर के सांदीपनि विद्यालयों को 100 प्रतिशत परीक्षा परिणाम और बेहतर शैक्षणिक प्रबंधन के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया था। ऐसे उदाहरण इस मॉडल के प्रति बढ़ती उम्मीदों को रेखांकित करते हैं।

हालांकि सरकारी विद्यालयों को लेकर दूसरा पक्ष भी है। प्रदेश के अधिकांश बच्चे अभी भी सामान्य सरकारी विद्यालयों में पढ़ते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सांदीपनि विद्यालयों में विकसित हो रहे अच्छे अनुभव और सुविधाएं व्यापक सरकारी शिक्षा व्यवस्था तक पहुंच पाएंगी?साथ ही,यदि संसाधन और गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं केवल चुनिंदा विद्यालयों तक सीमित रहती हैं तो शिक्षा व्यवस्था के भीतर असमानता का एक नया स्वरूप भी उभर सकता है।

बेहतर भवन, स्मार्ट क्लास और आधुनिक सुविधाएं किसी भी विद्यालय के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल इससे कहीं आगे का है।विद्यालय की सफलता का अंतिम पैमाना शिक्षकों के स्तर, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता, समझ, आत्मविश्वास और जीवन में आगे बढ़ने की तैयारी होती है। सांदीपनि विद्यालयों में अधोसंरचना पर जो निवेश किया गया है, उसका वास्तविक मूल्यांकन आने वाले वर्षों में सीखने के स्तर, विद्यार्थियों की उपलब्धियों और उच्च शिक्षा में उनकी प्रगति के आधार पर ही किया जा सकेगा।

इन सबके बावजूद यह कहा जा सकता है कि सांदीपनि विद्यालयों ने कम से कम यह बहस तो शुरू की है कि सरकारी विद्यालय भी बेहतर अधोसंरचना, आधुनिक सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण वातावरण के साथ संचालित किए जा सकते हैं। यह मॉडल कितना सफल होगा और इसका प्रभावसरकारी शिक्षा व्यवस्था पर कितना पड़ेगा,इसका जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा।फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि इन विद्यालयों ने सरकारी शिक्षा को लेकर नई उम्मीद और नई चर्चा पैदा की है। यदि इन विद्यालयों के सकारात्मक अनुभवों को व्यापक सरकारी स्कूल व्यवस्था तक पहुंचाया गया और गुणवत्ता पर लगातार ध्यान बना रहा, तो यह पहल मध्यप्रदेश की स्कूली शिक्षा में लंबे समय तक प्रभाव छोड़ सकती है। (संवाद)