सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत में चुनाव विवादों के घेरे में हैं और विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि चुनाव अब निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि भारत का चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के बीच साठगांठ है और उन्होंने मिलकर भाजपा के पक्ष में अनुचित तरीके अपनाए हैं। जब लोग चुनाव आयोग के अधिकारियों द्वारा विपक्ष के खिलाफ भाजपा का पक्ष लेने का "साफ़ और स्पष्ट" उदाहरण देख सकते हैं, तो चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसमें हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक रोक का हवाला देना जन-चिंता का विषय है। कारण चाहे जो भी हो, कानून के अनुसार भी "देर से मिलने वाला न्याय" चिंता का विषय है, और इसका लोगों की सोच और न्यायपालिका में उनके भरोसे पर असर पड़ेगा।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा, इसमें जाने से पहले, मामले की थोड़ी पृष्ठभूमि जानना मौजूदा स्थिति को समझने में मददगार होगा। मध्य प्रदेश में 3 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव 18 जून को होने थे। इसके लिए नामांकन पत्रों की जांच की तारीख 9 जून और उम्मीदवारी वापस लेने की आखिरी तारीख 11 जून तय की गई थी। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र को निर्वाचन अधिकारी ने खारिज कर दिया। यह फैसला भाजपा उम्मीदवारों और नेताओं की आपत्तियों के बाद लिया गया। उन्होंने शिकायत की थी कि कांग्रेस उम्मीदवार ने अपने हलफनामे में हैदराबाद की अदालत में अपने खिलाफ चल रहे एक आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। वैसे हैदराबाद की इस अदालत ने 12 जून को ही मामले की याचिका को यह कहते हुए वापस कर दिया कि यह उसके क्षेत्राधिकार में नहीं था।
जो भी हो, मामला आखिर क्या है? यह कांग्रेस की एक महिला कार्यकर्ता की निजी शिकायत है। उन्होंने कुछ वरीय नेताओं पर उनके साथ गलत व्यवहार करने का आरोप लगाया था और कहा था कि तेलंगाना के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की प्रभारी होने के नाते, नटराजन उन्हें परेशान करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहीं। हैदराबाद की अदालत में आवेदन करने के पहले पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी जिसमें नटराजन का नहीं बल्कि अन्य अभियुक्तों का नाम था। अदालत में अपने आवेदन में उस पीड़ित महिला ने नटराजन को चौथा प्रतिवादी बनाया गया था। यह अभी तक आपराधिक मामला नहीं बना है क्योंकि अदालत ने अभी तक इसका संज्ञान नहीं लिया था, और अब 12 जून को आवेदन को लौटा भी दिया है। इसलिए, नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक मामला ही मौजूद नहीं था।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत, चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने वाले उम्मीदवारों को अपने खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे में देनी होती है। निर्वाचन अधिकारी ने नटराजन के नामांन पत्र इस आधार पर खारिज कर दिए कि उन्होंने अपने हलफनामे में उस मामले का जिक्र नहीं किया था। उल्लेखनीय है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत सिर्फ़ उन्हीं मामलों की जानकारी देनी होती है जिनमें दो साल या उससे ज़्यादा की सज़ा का प्रावधान हो और, सबसे अहम बात, सिर्फ़ उन्हीं मामलों की जिनमें आरोप तय किए जा चुके हों।
उम्मीदवारों द्वारा नामांकन पत्र वापस लेने की आखिरी तारीख 11 जून को शाम 4 बजे तक थी। नटराजन के नामांकन पत्र खारिज होने के बाद, कोई विपक्षी उम्मीदवार नहीं बचा और भाजपा के तीनों उम्मीदवारों को निर्विरोध चुना हुआ घोषित किया जाना था। इसे देखते हुए, मीनाक्षी ने न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और निर्वाचन अधिकारी के फैसले पर रोक लगाने की अपील की। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन निर्वाचन अधिकारी के आदेश की वैधता की जांच करने पर सहमति जताई और मामले की सुनवाई 12 जून के लिए तय कर दी। पीठ का मानना था कि अदालतें आमतौर पर चुनावी विवादों में तत्काल सुनवाई रिट के जरिए दखल नहीं देती हैं।
कांग्रेस उम्मीदवार की ओर से पेश होते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि "साफ तौर पर अनियमितताओं" के मामलों में संवैधानिक अदालतें हमेशा दखल दे सकती हैं। उन्होंने अदालत से यह भी आग्रह किया था कि कम से कम चुनाव आयोग को नतीजे घोषित न करने का निर्देश दिया जाए, क्योंकि अदालत 12 जून को मामले पर सुनवाई करेगी। अदालत ने ऐसा आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। इस बीच, भाजपा के तीनों उम्मीदवारों को निर्विरोध चुना गया, जिससे इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और ईमानदारी पर और सवाल उठने लगे। स्थिति और भी खराब थी। निर्वाचन अधिकारी ने एक भाजपा उम्मीदवार से ज़रूरी शर्तों को पूरा करने के लिए हलफ़नामे में सुधार करने को कहा था, जो साफ़ तौर पर भाजपा को फ़ायदा पहुंचाने जैसा था।
इस बात पर ज़बरदस्त विवाद खड़ा हो गया। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इस पूरी घटना को "मिली-भगत से की गई चोरी" करार दिया और आरोप लगाया कि इस सुनियोजित राजनीतिक साज़िश में सभी शामिल थे। उनकी टिप्पणी 11 जून को सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के बाद सामने आई, जिसमें उन्होंने कहा, "मुझे पता था कि जब चोरी होती है, तो उसमें सभी शामिल होते हैं। सिर्फ़ राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और - मुझे यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है – सर्वोच्च न्यायालय भी। जब सर्वोच्च न्यायालय को पता था कि हमारी याचिका शाम 4 बजे के बाद बेअसर हो जाएगी, तो आज सुनवाई क्यों नहीं हुई? इसे कल के लिए क्यों तय किया गया? यह सब मिली-जुली चोरी का मामला है।" भाजपा ने दिग्विजय सिंह के इन बयानों की आलोचना की। यहां तक कि कांग्रेस नेता राहुल ने भी आरोप लगाया कि 'वोट चोरी' और 'सरकार चोरी' के बाद भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत ने राज्यसभा चुनाव शुरू होने से पहले ही उन्हें खत्म कर दिया है, और उन्होंने 'सीट चोरी' का आरोप भी लगाया।
12 जून को नटराजन की याचिका को खारिज करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव से जुड़े विवादों में कानून यह तय कर चुका है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद चुनाव याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि जहां नामांकन रद्द करना साफ तौर पर गैर-कानूनी, मनमाना और गलत हो, वहां कोर्ट को दखल देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 329(बी) में, जो विधायी पदों के लिए चुनावों को चुनौती देने से संबंधित है, इस तरह के अंतर के लिए कोई जगह नहीं है। (संवाद)
नटराजन की न्याय की गुहार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करना अहम
संवैधानिक रोक का हवाला दिया, लेकिन चुनाव याचिका दायर करने की इजाज़त दी
डॉ. ज्ञान पाठक - 2026-06-13 11:04 UTC
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन द्वारा दायर रिट याचिका को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज करना एक अहम घटनाक्रम है। यह याचिका निर्वाचन अधिकारी द्वारा उनके नामांकन पत्रों को कथित तौर पर गलत तरीके से खारिज किए जाने के खिलाफ थी। 11 जून को, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन अधिकारी के खारिज करने के आदेश की वैधता की जांच के लिए 12 जून को सुनवाई हेतु याचिका स्वीकार की थी। हालांकि, जब मामला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एएस चंडुरकर की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया, तो उन्होंने संवैधानिक रोक का हवाला देते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। निर्वाचन अधिकारी के फैसले की वैधता के मुद्दे पर कोई सुनवाई नहीं हुई, और पीठ ने उन्हें जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका दायर करके इस फैसले को चुनौती देने की छूट दी।