पूर्व माकपा पोलित ब्यूरो सदस्यब्रिंदा करातने भी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रीशिवराज सिंह चौहानको लिखे पत्र में कहा कि मनरेगा श्रमिकों से बातचीत के आधार परयह स्पष्ट हैकि मनरेगा को समाप्त करना ग्रामीण गरीबों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है।पत्र में सबसे पहले यह सवाल उठाया गया है कि क्या नए नियम संविधान के अनुच्छेद 258 की भावना के अनुरूप हैं। करात का तर्क है कि नया कानून राज्यों पर अतिरिक्त प्रशासनिक और वित्तीय दायित्व डालता है, लेकिन इसके लिए न तो राज्यों से परामर्श किया गया और न ही उनकी सहमति ली गई। उन्होंने अनुच्छेद 258(3) का हवाला देते हुए कहा कि यदि केंद्र राज्यों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां डालता है तो उससे जुड़ी लागत की भरपाई भी की जानी चाहिए।

विपक्षी दलों का कहना है कि नए नियमों में निर्णय लेने की लगभग सारी शक्तियां केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित कर दी गई हैं। इससे संघीय व्यवस्था कमजोर होती है क्योंकि राज्यों की भूमिका केवल उन्हीं सीमाओं तक रह जाती है, जिन्हें केंद्र निर्धारित करता है। उनका यह भी आरोप है कि निधियों के आवंटन के लिए तय किए गए तथाकथित वस्तुनिष्ठ मानदंड न तो निष्पक्ष हैं और न ही ग्रामीण रोजगार की वास्तविक जरूरतों को प्रतिबिंबित करते हैं। इसके अलावा नियम तकनीक पर अत्यधिक निर्भर हैं और मजदूरी निर्धारण के स्पष्ट मानदंड भी निर्धारित नहीं करते।

नया कानून पहले ही मांग-आधारित रोजगार व्यवस्था को सीमित कर निधि-आधारित व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें केंद्र केवल 60 प्रतिशत व्यय वहन करेगा। इसके बाद जारी नियम राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण के लिए 16वें वित्त आयोगकी क्षैतिज कर-वितरण (हॉरिजॉन्टल डिवोल्यूशन) संबंधी सिफारिशों को आधार बनाते हैं। सवाल है कि किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) या जनसंख्या का ग्रामीण श्रमिकों की रोजगार मांग से क्या संबंध है?

ब्रिंदा करात ने उदाहरण देते हुए कहा है किकेरलअपेक्षाकृत कम आबादी वाला राज्य है, लेकिन वहां प्रति वर्ष औसतन 66 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। दूसरी ओरतमिलनाडुदेश के उच्च जीएसडीपी वाले राज्यों में शामिल होने के बावजूद सक्रिय मनरेगा श्रमिकों की संख्या सबसे अधिक रखने वाले राज्यों में है। ऐसे राज्यों को नए मानदंडों के कारण कम संसाधन मिलने की आशंका है।उनका कहना है किबेहतर प्रदर्शन बेहतर प्रदर्शन के आधार पर राज्यों को अतिरिक्त निधि देने की व्यवस्था भी रोजगार के अधिकार को सरकारी प्रदर्शन से जोड़ने जैसी है, जो उचित नहीं है।

नियम 403(ई) में प्रयुक्त "अतिरिक्त व्यय" (एक्सेस एक्सपेंडिचर) शब्द पर भी आपत्ति जताई गई है। यदि कोई राज्य अपने संसाधनों से ग्रामीण रोजगार पर अधिक खर्च करना चाहता है तो उसे अतिरिक्त व्यय कहना अनुचित है। वास्तव में राज्योंको अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अधिक निवेश करने के लिए स्वतंत्र होने चाहिए। राज्य के व्यय को केंद्रीय वित्तीय निगरानी प्रणाली से अनिवार्य रूप से जोड़ना राज्यों की स्वायत्तता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

मजदूरी भुगतान और श्रमिक पहचान से जुड़े नियमों पर भी सवाल हैं। नियमों में मजदूरी दर तय करने, महंगाई के अनुसार समय-समय पर वृद्धि करने अथवा मूल्य सूचकांक से उसे जोड़ने जैसी महत्वपूर्ण बातों का कोई उल्लेख नहीं है। इसके बजाय पूरा जोर ऑनलाइन पंजीकरण और तकनीकी प्रक्रियाओं पर दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की सीमित उपलब्धता को देखते हुए व्यक्तिगत ऑनलाइन पंजीकरण की अनिवार्यता व्यावहारिक नहीं है।

श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए अन्य प्रभावी तरीके भी उपलब्ध हैं। अधिकारियों की अनियमितताओं की सजा मजदूरों को नहीं मिलनी चाहिए। केवल तकनीक को न्याय का पर्याय मान लेना गलत है। वर्तमान उत्पादकता मानदंड इतने कठिन हैं कि कई बार श्रमिक न्यूनतम मजदूरी भी अर्जित नहीं कर पाते। विशेष रूप से महिला श्रमिकों की बड़ी भागीदारी को देखते हुए समय-उपयोग सर्वेक्षणों के आधार पर यथार्थवादी कार्य मानदंड तय किए जाने चाहिए।

ई-केवाईसी और आधार सत्यापन की अनिवार्यता पर भी आपत्ति जताई गई है।संक्रमण काल में केवल ई-केवाईसी सत्यापित और आधार से जुड़े जॉब कार्डों को मान्यता देने से लगभग 44 प्रतिशत सक्रिय श्रमिक रोजगार से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार अभी केवल 56 प्रतिशत सक्रिय श्रमिकों का ई-केवाईसी सत्यापन पूरा हुआ है। जिन श्रमिकों के पास अन्य वैध पहचान दस्तावेज उपलब्ध हैं, उन्हें केवल तकनीकी कारणों से रोजगार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर की संचालन समिति और केंद्रीय परिषद की संरचना पर भी सवाल हैं। प्रस्तावित समिति मुख्यतः केंद्र सरकार द्वारा नामित नौकरशाहों की संस्था बनकर रह जाएगी, जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व भी सीमित है और श्रमिक संगठनों या अन्य हितधारकों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा महिला श्रमिकों की बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद जनजातीय कार्य, सामाजिक न्याय तथा महिला एवं बाल विकास जैसे मंत्रालयों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

जब राज्य कुल लागत का 40 प्रतिशत वहन करेंगे, तब निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी समान रूप से सुनिश्चित होनी चाहिए। वर्तमान व्यवस्था राज्यों पर वित्तीय जिम्मेदारी तो डालती है, लेकिन निर्णय लेने का अधिकार लगभग पूरी तरह केंद्र सरकार के पास रखती है। इसी कारण सभी आठ नियमों पर पुनर्विचार कर उन्हें वापस लेने की मांग की जा रही है। (संवाद)