पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय और राज्य स्तर की अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं विवादों में रही हैं। कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई से यह संकेत मिला कि समस्या केवल किसी एक अभ्यर्थी की नकल या स्थानीय स्तर की लापरवाही तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर उसकी छपाई, परिवहन, परीक्षा केंद्रों और पूरी परीक्षा प्रक्रिया तक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए। परिणामस्वरूप लाखों छात्रों की वर्षों की मेहनत और परिवारों का आर्थिक निवेश अनिश्चितता के बीच फंस गया।
ऐसे समय में शिक्षा व्यवस्था को लेकर देशव्यापी चर्चा शुरू करने का प्रयास "छात्रों की गूंज"अभियान के माध्यम से किया जा रहा है। इसकी पृष्ठभूमि में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कोटा में छात्रों से संवाद भी महत्वपूर्ण है। देश की प्रतियोगी परीक्षा संस्कृति के सबसे बड़े केंद्रों में से एक कोटा में उन्होंने छात्रों के अनुभव सुने और शिक्षा, परीक्षा तथा रोजगार से जुड़े प्रश्नों को व्यापक सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाने की कोशिश की। इसके बाद शुरू हुआ यह अभियान केवल पेपर लीक का विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, पारदर्शिता और भरोसा बहाल करने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास है।
इस अभियान का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि इसमें केवल राजनीतिक भाषणों पर जोर नहीं है, बल्कि छात्रों के अनुभवों को केंद्र में रखने की कोशिश दिखाई देती है। मध्यप्रदेश में पन्ना के लक्ष्य और खंडवा की खुशी जैसे छात्र जब सार्वजनिक मंच पर आकर अपनी समस्याएं और अपने भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं, तो यह केवल विद्यार्थियों की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रह जाती। यह उस व्यवस्था का आईना बन जाती है, जहां छात्र अपनी मेहनत से ज्यादा परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं।यदि एक मेधावी छात्र उत्तरपुस्तिका के मूल्यांकन पर भरोसा नहीं कर पा रहा और दूसरी छात्रा परीक्षा संबंधी अनिश्चितताओं के कारण अपने मेडिकल के सपने को अधर में महसूस कर रही है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि शिक्षा व्यवस्था में केवल छोटे-मोटे सुधार नहीं, बल्कि परीक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन, परिणाम और भर्ती प्रक्रिया की पूरी संरचना पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य है। कोटा सहित देश के अनेक हिस्सों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, परिणामों में विवाद, भर्ती में वर्षों की देरी और भविष्य की अनिश्चितता छात्रों के मानसिक दबाव को और बढ़ा देती है। किसी भी देश के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि उसके युवा अपनी मेहनत की कमी से नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों से निराश होने लगें। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य अवसरऔर भरोसा देना होना चाहिए, भय और असुरक्षा पैदा करना नहीं।
इसलिए अब बहस केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक पेपर लीक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें परीक्षा के प्रत्येक चरण की स्वतंत्र निगरानी हो, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, समयबद्ध वार्षिक परीक्षा एवं भर्ती कैलेंडर लागू हो, उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से तय हो और छात्रों को यह भरोसा मिले कि उनकी मेहनत किसी प्रशासनिक लापरवाही या भ्रष्ट नेटवर्क की भेंट नहीं चढ़ेगी। शिक्षा सुधार की चर्चा में अब गुणवत्ता, समान अवसर, किफायती शिक्षा और रोजगार से उसके संबंध को भी बराबर महत्व देना होगा।
भारतीय युवा कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया की अगुवाई में चल रहे "छात्रों की गूंज" अभियान के तहत देश के 28 शहरों में छात्रों, अभिभावकों और समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद किया जा रहा है। इसके माध्यम से कांग्रेस शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को व्यापक जनचर्चा का विषय बनाने की कोशिश कर रही है। अभियान के समापन पर9 अगस्तको दिल्ली में संसद का घेराव कर परीक्षा प्रणाली, शिक्षा सुधार और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सुझावों को राष्ट्रीय स्तर पर रखने की योजना है। साथ ही, पूरी शिक्षा व्यवस्था को लेकर स्टूडेंट चार्टर भी जारी किया जाएगा।
इस पहल की वास्तविक सफलता इस बात में होगी कि क्या यह अभियान छात्रों के परिवारों, अभिभावकों और उनसे जुड़े लोगों तक यह संदेश पहुंचाने में सफल होता है कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल छात्रों का नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का प्रश्न है। यदि यह अभियान शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और जवाबदेही के सवाल को छात्रों से आगे बढ़ाकर उनके परिवारों और समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचा सका, तो इसके परिणाम केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी सार्थक माने जाएंगे। (संवाद)
क्या शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का आवाज बन पाएगी 'छात्रों की गूंज'
परीक्षा की निष्पक्षता, छात्रों का भविष्य और जवाबदेही का सवाल
राजु कुमार - 2026-07-02 02:05 UTC
देश की शिक्षा व्यवस्था आज केवल संसाधनों, पाठ्यक्रम या संस्थानों की चुनौतियों से नहीं जूझ रही है। सबसे बड़ा संकट उस भरोसे का है, जिसके आधार पर करोड़ों छात्र और उनके परिवार वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। जब बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों पर विवाद और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो सवाल केवल किसी एक परीक्षा का नहीं रह जाता। यह उस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न बन जाता है, जिस पर युवाओं का भविष्य टिका हुआ है।