सूद के मुताबिक लैंडाऊ ने उस नई दिल्ली बैठक में कहा था, "हमने चीन को एक बड़ी आर्थिक ताकत बनने में मदद करके गलती की। हम भारत के साथ ऐसा नहीं करने जा रहे हैं। हम वह गलती दोबारा नहीं करेंगे।" सूद ने यह साक्षात्कार ब्रिटिश करेंट अफेयर्स प्रोग्राम न्यू ऑर्डर में दिया था, जिसे होस्ट ने लैंडाऊ की टिप्पणी के मूल वीडियो के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किया था। इस साक्षात्कार ने राजनयिक हल्कों में हंगामा मचा दिया है।

लैंडाऊ अभी भी डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट हैं और उन्हें ट्रंप की मगा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) लॉबी के साथ-साथ अपने बॉस सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रुबियो के भी करीब माना जाता है। जहां तक भारत-अमेरिकी रिश्तों की बात है, रुबियो सबसे ज़्यादा दिखने वाले अमेरिकी अधिकारी हैं, लेकिन लैंडाऊ ट्रंप प्रशासन के मन की बात कहते हैं। वह द्विपक्षीय रिश्तों के भविष्य के बारे में अमेरिकी सोच के बारे में खुलकर बात करते हैं।

हाल के दिनों में, ट्रंप प्रशासन भारत सहित भारत-प्रशांत सुरक्षा के अपने पुराने विचार में कम दिलचस्पी ले रहा है। ट्रंप प्रशासन की बड़ी एशिया रणनीति में भारत की अहमियत कम हो गई है। यह सब इस साल मई में बीजिंग में ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन के बाद हुआ है। नतीजतन, अब उसका ध्यान भारत से व्यापार और रक्षा खरीद में ज़्यादा से ज़्यादा छूट लेने पर है, और साथ ही यह पक्का करना है कि भारत के विकास की रफ़्तार अमेरिकी आर्थिक शक्ति के लिए कोई खतरा न बने।

भारतीय विदेश मंत्रालय भी अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी क्रिस्टोफर लैंडाऊ की टिप्पणी के असली मतलब का अंदाज़ा लगा रहे हैं, लेकिन चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी क्योंकि लैंडाऊ ने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका अब भारत के मामले में ऐसी गलती नहीं करेगा।

चीनी जानकारों ने नई दिल्ली के प्रति वाशिंगटन के नज़रिए को "लिमिटेड इंगेजमेंट और सीलिंग कंट्रोल" की दोहरी रणनीति बताया। उसने तर्क दिया कि अलग-अलग राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं, विश्व व्यवस्था के नज़रिए, भूराजनीतिक हितों, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और राजनयिक परंपराओं से पैदा हुए गहरे ढांचागत विरोधाभासों को भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक बातचीत या आर्थिक सहयोग से पूरी तरह हल नहीं किया जा सकता।

सिंघुआ विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय रणनीति संस्थान में अनुसंधान विभाग के निदेशक कियान फेंग ने सोमवार को ग्लोबल टाइम्स को बताया कि पिछले दो दशकों में अमेरिका-भारत संबंधों का तेज़ी से विस्तार एक हद तक पहुंच रहा है, क्योंकि दोनों देश ऐसे ढांचागत विरोधाभासों का सामना कर रहे हैं जिन्हें सुलझाना मुश्किल है। ये अंतर उनके विकास के अलग-अलग चरण, रणनीतिक संस्कृति, भूराजनीतिक स्थिति, राजनयिक परंपराओं और उनके नेतृत्व के विदेश नीति आधार से पैदा होते हैं।

कियान ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए भारत की लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता, वॉशिंगटन के सहयोग आधारित दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। नई दिल्ली ने अमेरिका के रणनीतिगत मकसदों के साथ पूरी तरह से जुड़ने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर लगातार एक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है। क्वाड और भारत-प्रशान्त रणनीति जैसे ढांचे के अंदर भी भारत अमेरिका के साथ एक औपचारिक सहयोगी या कनीय सुरक्षा भागीदार के बजाय एक बराबर के भागीदार के तौर पर जुड़ना चाहता है।

ऑफिशियल मीडिया में चीनी विशेषज्ञ की इस टिप्पणी से पता चलता है कि चीन अब भारत-चीन द्विपक्षीय संबंध को बेहतर बनाने के लिए भारत को लुभाने की कोशिश कर रहा है और अपने पहले के इस रूख को नरम कर दिया है कि अमेरिका ने अपनी भारत-प्रशान्त रणनीति में भारत को एक भागीदार के तौर पर लिया है, जो मुख्य रूप से चीन के खिलाफ थी। चीनी विश्लेषक का ज़ोर इस बात पर है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी दबाव को नज़रअंदाज़ करते हुए एक स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश कर रहे थे।

चीनी विशेषज्ञ के मुताबिक लैंडाऊ की बातें भारत के प्रति वॉशिंगटन के बड़े दृष्टिकोण को दिखाती हैं, और वह है भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नई दिल्ली का समर्थन मांगते हुए उसे औद्योगिक श्रृंखला के निचले सिरे पर लॉक करना। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी रणनीति भारत के रणनीतिगत लक्ष्यों के खिलाफ है।

कियान फेंग के अनुसार, "उद्योगीकरण सभी विकासशील देशों का एक कानूनी अधिकार है। ज़ीरो-सम सोच (एक का लाभ दूसरे की हानि है) से प्रेरित होकर, अमेरिका दूसरे देशों के विकास पर एक सीमा लगाना चाहता है। टैरिफ और तकनीकी रुकावटों के ज़रिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को तोड़कर, यह भारत को ब्रिक्स फ्रेमवर्क के साथ-साथ चीन और रूस के साथ सहयोग को और गहरा करने के लिए ही प्रेरित करेगा, जिससे औद्योगिक श्रृंखला के विविधिकरण में तेज़ी आएगी।"

अभी भारत और अमेरिका 2026 के खत्म होने से बहुत पहले व्यापार समझोते को पूरा करने की दौड़ में लगे हैं। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि 99 प्रतिशत मुद्दे बातचीत में सुलझा लिया गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दोनों देशों के बीच व्यापार का ढांचा लगभग तैयार है। लेकिन भारत-अमेरिका व्यापार बातचीत के आखिरी दौर में भी, अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत प्रतिबंध लगाने की बात कही। इसका मतलब था कि जांच के दायरे में आने वाले देशों (जिनमें भारत भी शामिल है) पर 12.5 प्रतिशत ड्यूटी लगाई जाएगी।

प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की पूरी जानकारी तो नहीं है, लेकिन वरिष्ठ अधिकारी लैंडाऊ के बयान का लहज़ा कई व्यापार विशेषज्ञों की उन आशंकाओं को सही ठहराता है कि अमेरिका जल्दबाज़ी में भारत पर ऐसा व्यापार समझौता थोप रहा है जिसमें सिर्फ़ अमेरिका के हितों की रक्षा हो रही है, भारत के नहीं। अब समय आ गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार हिम्मत दिखाए और भारतीय किसानों और अन्य वर्गों के हितों की रक्षा करे, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिकी वार्ताकार अपने किसानों और उद्योगों के हितों की रक्षा कर रहे हैं।

भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है और इसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है। इसकी तरक्की इसके संसाधनों, मानव पूंजी और कई अन्य संपत्तियों पर निर्भर करती है। देश को निश्चित रूप से अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की ज़रूरत है। लेकिन यह समझौता बराबरी के आधार पर होना चाहिए। किसी भी देश को, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की को दबाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। अमेरिका के साथ बातचीत के दौरान भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर ज़ोर देना ही अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाऊ को सबसे माकूल जवाब होगा। चीन ने ऐसा करके दिखाया है। भारत भी अमेरिका के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत करके ऐसा ही कर सकता है। (संवाद)