भारत में पिछले कुछ वर्षों से गर्मी का स्वरूप लगातार बदल रहा है। लू की अवधि लंबी हो रही है, तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है और शहरों से लेकर गांवों तक सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) कीएनुअल क्लाइमेट स्टेटमेंट 2025 के अनुसार 1901 से अब तक केदर्ज रिकॉर्ड में वर्ष 2024 कोभारत का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया।यही नहीं, वर्ष 2016 से 2025 का दशक अब तक का सबसे गर्म दशक के रूप में दर्ज किया गया है। सबसे अधिक असरउस पीढ़ी पर पड़ रहा है, जो आने वाले भारत का भविष्य है।
अभी हाल ही में क्राई संस्था ने मई-जून 2026 के दौरान 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 3,096 स्कूली बच्चों के बीच "फीलिंग द हीट : चिल्ड्रन्स वॉइसेज ऑन हीट, वेल-बीइंग एंड लर्निंग इन इंडिया"विषय पर एक प्रारंभिकअध्ययनकिया। इस अध्ययन की विशेषता यह है कि इसमें बढ़ते तापमान के प्रभावों को बच्चों के अपने अनुभवों और आवाज के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया है।
बढ़ती गर्मी अब बच्चों के लिए सीधे शिक्षा का संकट बनती जा रही है। अध्ययन में शामिल 88 फीसदी बच्चों ने महसूस किया कि इस वर्ष की गर्मी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक थी। लगभग 68 फीसदी बच्चों ने बताया कि भीषण गर्मी के कारण उन्हें स्कूल नहीं जा पाने या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।76 फीसदी बच्चों ने स्वीकार किया कि अत्यधिक गर्मी के कारण उनके लिए पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो गया। झारखंड की 17 वर्षीय एक छात्रा ने बताया, "एक दिन इतनी ज्यादा गर्मी थी कि स्कूल में पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं लगा। कक्षा बेहद गर्म थी, जल्दी थकान होने लगी और बार-बार प्यास लग रही थी। शिक्षक क्या पढ़ा रहे थे, उस पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो गया था।"लगभग आधे बच्चों ने दोपहर के समय को सबसे कठिन बताया, जबकि 45 फीसदी बच्चों ने कहा कि गर्मी के दिनों में स्कूल का समय सबसे अधिक असहज होता है।इससे पता चलता है कि बढ़ता तापमान अब बच्चों की सीखने की क्षमता और नियमित शिक्षा, दोनों को प्रभावित कर रहा है।
गर्मी का असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। 63 फीसदी बच्चों ने डिहाइड्रेशन, 51 फीसदी ने सिरदर्द और 44 फीसदी ने अत्यधिक थकान की शिकायत की। आधे से अधिक बच्चों ने बताया कि उनकेघरों में बिजली कटौती होती है या रहने की जगह इतनी गर्म हो जाती है कि सामान्य दिनचर्या भी मुश्किल हो जाती है। लगभग तीन में से एक बच्चे ने पानी की कमी का भी अनुभव किया।
अध्ययन का एक निष्कर्ष यह भी है कि बढ़ती गर्मी का असर सभी बच्चों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा। दिहाड़ी मजदूरी या शारीरिक श्रम पर निर्भर परिवारों के 71 फीसदी बच्चों ने गंभीर गर्मी संबंधी परेशानियों की बात कही, जबकि अन्य परिवारों में यह अनुपात 46 फीसदी रहा। यह अंतर बताता है कि जलवायु परिवर्तन का संकट सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को और गहरा कर देता है तथा सबसे अधिक मार उन बच्चों पर पड़ती है, जिनके परिवारों के पास पहले से ही संसाधनों का अभाव है।
अध्ययन में 59 फीसदी बच्चों ने कहा कि बढ़ती गर्मी के कारण उनके माता-पिता के लिए काम करना कठिन हो गया है। वहीं 58 फीसदी बच्चों ने अपने माता-पिता के व्यवहार या मनोदशा में बदलाव महसूस किया।दिल्ली की 11 वर्षीय एक बच्ची ने कहा, "एक दिन मेरे पिता गर्मी की वजह से बहुत बीमार हो गए और उस दिन काम पर नहीं जा सके। हम सब्जियां और दूध भी नहीं खरीद पाए। मैं उनकी देखभाल के लिए घर पर ही रही।"इन अनुभवों से स्पष्ट होता है कि अत्यधिक गर्मी का असर केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका और जीवन पर पड़ता है।
क्राई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी पूजा मारवाह ने इस अध्ययन पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा, "अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह जलवायु परिवर्तन पर होने वाली चर्चा के केंद्र में बच्चों की आवाज को रखता है। तापमान के आंकड़े हमें बताते हैं कि गर्मी कितनी बढ़ रही है, लेकिन बच्चे हमें बताते हैं कि यह गर्मी उनके जीवन पर किस तरह असर डाल रही है—यह उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और समग्र कल्याण को कैसे प्रभावित कर रही है। अध्ययन में बच्चे केवल अपनी ही बात नहीं कर रहे हैं। वे हमें यह भी बता रहे हैं कि उनके माता-पिता किन दबावों और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, उनके घरों में क्या बदलाव आ रहे हैं और ऐसे कौन-से छोटे-छोटे उपाय हैं, जो भीषण गर्मी के दौरान उनके जीवन को अधिक सुरक्षित बना सकते हैं। ये बेहद महत्वपूर्ण अनुभव हैं, जिन पर हीट एक्शन प्लान और जलवायु अनुकूलन की रणनीतियों को मजबूत बनाते समय नीति-निर्माताओं को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।"
अध्ययन मेंबच्चों ने हीटवेव के दौरान स्कूलों का समय बदलने, कक्षाओं में पंखों की व्यवस्था करने, सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने, सार्वजनिक स्थानों पर अधिक छाया विकसित करने की आवश्यकता बताई। कई बच्चों ने यह भी कहा कि "जब गर्मी के कारण हमारा ध्यान नहीं लग पाता तो हमें डांटिए मत।"वहीं एक बच्चे ने सुझाव दिया कि "बहुत गर्म दिनों में स्कूल का समय बदल दिया जाए, ताकि बच्चों को दोपहर की धूप में पैदल घर न लौटना पड़े।"ये बातें बताती हैं किबढ़ती गर्मी से निपटने के लिए केवल बड़े नीतिगत निर्णय ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे व्यावहारिक उपाय भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
बढ़ती गर्मी से निपटना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की सुरक्षा का भी प्रश्न है। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह चुनौती कहीं अधिक गंभीर है। इसलिए हीट एक्शन प्लान और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जुड़ी रणनीतियोंमें बच्चों की जरूरतों और अनुभवों को केंद्र में रखना समय की मांग है। (संवाद)
बचपन पर भारी पड़ रही बढ़ती गर्मी
क्राई अध्ययन : भीषण गर्मी से हर दस में से सात बच्चे नहीं जा पाए स्कूल
राजु कुमार - 2026-07-09 12:55 UTC
किसी भी प्राकृतिक आपदा, जलवायु संकट या पर्यावरणीय बदलाव का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। इसकी सबसे बड़ी कीमत अक्सर बच्चे, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर समुदाय चुकाते हैं। बच्चों के लिए यह केवल मौसम की असुविधा का प्रश्न नहीं होता, बल्कि उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मानसिक विकास और भविष्य से जुड़ा विषय बन जाता है। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी को अब केवल पर्यावरण के नजरिए से नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों और उनके समग्र विकास के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है।