देश की राजधानी दिल्ली में 12 व 13 सितंबर को होने वाला 18वां ब्रिक्स सम्मेलन कूटनीतिक दृष्टि से बहुत अहम तो है ही, साथ ही बड़ी चुनौतियों से भी भरा हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती चीन-रूस और अमेरिका के बीच संतुलन स्थापित करने की है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग जहां विश्व कूटनीति में ग्लोबल साउथ को मजबूत करने के लिए इस मंच का इस्तेमाल करना चाहते हैं, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आंखों में ब्रिक्स खटकता है और वह अपनी नाराजगी पहले कई बार जाहिर भी कर चुके हैं। ऐसे में भारत बिना किसी एक पक्ष का चयन किए ब्रिक्स का नेतृत्व करना चाहता है। यह शिखर सम्मेलन ब्रिक्स की स्थापना की 20वीं वर्षगांठ पर हो रहा है, जब बड़े पैमाने पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता और वैश्विक कूटनीति में उथल-पुथल है। वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम है—“लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण”, जो युद्ध और बढ़ते तनाव के माहौल में अपने आप में चुनौतीपूर्ण है।

दिल्ली में होने वाले इस शिखर सम्मेलन में चीन व रूस के राष्ट्रपतियों की शिरकत इसे और अहम बनाती है। ब्रिक्स के 11 देश दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, करीब 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी और करीब 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्रिक्स यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका का एक अंतर-सरकारी मंच है, जो वैश्विक, आर्थिक, वित्तीय, विकास संबंधी और राजनीतिक मुद्दों पर अपने रुख में समन्वय करता है। 2024-25 में इसके विस्तार के बाद इजिप्ट, इथोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसके सदस्य बने। इस तरह अब ब्रिक्स में 11 देश हैं। इस तरह ब्रिक्स दुनिया के 11 अहम उभरते बाजारों व विकासशील देशों को एक साथ ला रहा है।

ब्रिक्स के इस शिखर सम्मेलन में जहां दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का मिलन हो रहा है, वहीं उस पर बढ़ते वैश्विक तनावों, व्यापार विवादों और एनर्जी की चुनौतियों की सघन छाया रहने की आशंका है। चूंकि विश्व कूटनीति में ब्रिक्स का दायरा बहुत व्यापक है और इसकी दावेदारी भी बढ़ रही है, लिहाजा दुनिया भर की निगाहें, खासतौर पर पश्चिमी देशों की, इस पर गड़ी हुई हैं। वैसे भी ब्रिक्स की पहचान साउथ-साउथ सहयोग, उभरते बाजारों के बीच बेहतर समन्वय, बहुपक्षवाद और ग्लोबल साउथ के बढ़ते असर के रूप में होती है। ऐसे में यह शिखर सम्मेलन अमेरिका के दबदबे और पश्चिमी व विकसित देशों के एजेंडे के बरक्स दुनिया की आधी आबादी के एजेंडे को पेश करने का अहम प्लेटफॉर्म है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग की भारत में सात साल बाद यात्रा हो रही है, इसलिए फोकस में चीन बना हुआ है। चीन, ब्राजील और रूस की डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने की कोशिशें भी ब्रिक्स की चर्चाओं में परिलक्षित होंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2025 में सत्ता संभालने के बाद सबसे पहले चीन टैरिफ वार के निशाने पर आया था और उसके बाद भारत पर भी गाज गिरी थी। चीन ने जिस तरह जवाबी टैरिफ से अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दी, वह इस समय कनाडा सहित कई देशों का रास्ता बना हुआ है, यानी वे भी अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगा रहे हैं। ऐसे में चीन की रणनीति ब्रिक्स देशों को इस सम्मेलन के जरिए वर्ल्ड ऑर्डर के पुनर्गठन की दिशा में आगे बढ़ाने की होगी। यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन एक तरह से विश्व राजनीति में शक्तियों के पुनर्संतुलन का मौका दे रहा है। इसके जरिए ग्लोबल साउथ यानी मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील और उभरते देश अपनी दावेदारी मजबूत करेंगे।

यही वजह है कि ब्रिक्स में भारत की भूमिका अहम है। भारत अभी तक संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर चल रहा है। लेकिन सवाल है कि क्या अमेरिका ऐसा होने देगा। भारत एक ऐसा पुल है, जो तमाम विपरीत ध्रुवों के बीच सक्रिय है और कहीं से भी उसने संवाद बंद नहीं किया है। यह कूटनीतिक दांव भारत ब्रिक्स में भी चलने जा रहा है। यही वजह है कि भारत-अमेरिका संवाद के साथ-साथ भारत-रूस और भारत-ईरान के बीच भी वार्ता की संभावना बनी हुई है। ब्रिक्स, जी-20, क्वाड, एससीओ, आईबीएसए और इंडो-पैसेफिक संस्थानों में भारत की एक साथ भागीदारी उसे विभिन्न प्रतिस्पर्धी जियो-पॉलिटिकल प्लेटफॉर्मों पर अलग ढंग से संवाद स्थापित करने की ताकत देती है।

ऐसे में ब्रिक्स का यह शिखर सम्मेलन ग्लोबल साउथ की दावेदारी को और मजबूत करने वाला साबित होगा। व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और भुगतान प्रणाली पर व्यापक सहमति विकसित करना ब्रिक्स के सभी 11 देशों की प्राथमिकता है।