इन समझौतों को समझने के लिए 2017 की घटनाओं को याद करना जरूरी है। तब सऊदी अरब सहित चार देशों ने कतर की नाकेबंदी कर दी थी। तुर्किये ने कतर का साथ दिया और वहां अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई। हालांकि 2021 में सऊदी अरब और कतर के संबंध सामान्य होने लगे। अब दोनों देशों के साथ तुर्किये और पाकिस्तान के रक्षा संबंध मजबूत हो रहे हैं। जाहिर है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पुराने विरोध और नई साझेदारियां साथ-साथ चल सकती हैं।
मक्का और बद्र समझौतों में एक बुनियादी अंतर है। मक्का समझौता सामूहिक सुरक्षा से जुड़ा है। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। दूसरी ओर, बद्र समझौते का जोर हथियार निर्माण, तकनीक और अनुसंधान पर है। इसमें सामूहिक सैन्य कार्रवाई की बाध्यता नहीं है। हालांकि दोनों को एक ही सैन्य गठबंधन मानना सही नहीं होगा।
इन समझौतों के पीछे अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था और पश्चिमी हथियारों पर निर्भरता घटाने की कोशिश भी देखी जा सकती है। खाड़ी देशों की सुरक्षा में अमेरिका की लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आधुनिक लड़ाकू विमानों, मिसाइल रक्षा प्रणालियों और दूसरी सैन्य तकनीकों के लिए भी कई देश पश्चिम पर निर्भर हैं। लेकिन क्षेत्रीय संघर्षों और हथियारों की आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितताओं ने इन देशों को नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है।इसका मतलब यह नहीं कि ये देश अमेरिका से संबंध तोड़ रहे हैं। तुर्किये नाटो का सदस्य है और कतर में अमेरिका का महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा है। दरअसल, ये देश अमेरिकी सहयोग बनाए रखते हुए अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता भी बढ़ाना चाहते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति दिलचस्प होने के साथ कुछ सवाल भी खड़े करती है।भारत के सऊदी अरब, कतर और इंडोनेशिया के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। सऊदी अरब ऊर्जा और व्यापार का महत्वपूर्ण साझेदार है। कतर प्राकृतिक गैस का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। वहीं इंडोनेशिया के साथ भारत का रक्षा सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल और संयुक्त रक्षा उत्पादन को लेकर भी सहयोग विकसित हुआ है।
अब इंडोनेशिया उसी बद्र समझौते में शामिल है, जिसमें पाकिस्तान भी है। दूसरी ओर, सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ सामूहिक रक्षा समझौते का हिस्सा है। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि ये देश भारत के खिलाफ किसी मोर्चे पर खड़े हो गए हैं। भारत के साथ उनके अपने हित और संबंध हैं।
फिर भी कुछ सवाल महत्वपूर्ण हैं। संयुक्त अनुसंधान से विकसित तकनीक किन देशों तक पहुंचेगी? क्या किसी सदस्य को मिली संवेदनशील तकनीक दूसरे सदस्य को भी उपलब्ध होगी? और भारत-पाकिस्तान तनाव की स्थिति में सऊदी अरब अपने रक्षा समझौते को किस तरह देखेगा? फिलहाल इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं हैं।
दरअसल, दुनिया अब शीतयुद्ध जैसी दो खेमों वाली व्यवस्था से अलग दिशा में बढ़ रही है। देश अमेरिका से सुरक्षा सहयोग रखते हुए चीन से व्यापार और दूसरे देशों के साथ हथियार निर्माण की साझेदारी कर रहे हैं। मक्का और बद्र जैसे समझौते इसी बदलती राजनीति का हिस्सा हैं। हालांकि इनसे कितनी वास्तविक सैन्य और तकनीकी क्षमता विकसित होगी, यह अभी देखना बाकी है।
भारत के लिए फिलहाल कोई सीधा संकट दिखाई नहीं देता। लेकिन बदलते रक्षा संबंधों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। भारत को अपने साझेदार देशों के साथ संबंध मजबूत रखने के साथ रक्षा अनुसंधान, स्वदेशी तकनीक और हथियार उत्पादन पर अधिक ध्यान देना होगा। आखिरकार, सवाल केवल यह नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है, बल्कि यह भी है कि आने वाले वर्षों में सैन्य तकनीक, हथियारों के उत्पादन और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर किसका कितना नियंत्रण होगा। (संवाद)
मक्का से बद्र तक : नए रक्षा गठजोड़ और भारत के सामने सवाल
अमेरिकी सुरक्षा छतरी से बाहर नए रास्ते तलाशती दुनिया
भाषा सिंह - 2026-10-23 11:23 UTC
दुनिया में नए रक्षा गठजोड़ बन रहे हैं। इनका मकसद केवल सैन्य ताकत बढ़ाना नहीं, बल्कि हथियारों के उत्पादन और तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम करना भी है। 21 अक्टूबर को कतर की राजधानी दोहा में तुर्किये, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और कतर ने ‘बद्र समझौता ज्ञापन’ पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत चारों देश मिलकर सैन्य उपकरण बनाएंगे, तकनीक साझा करेंगे और रक्षा अनुसंधान को बढ़ावा देंगे। इससे पहले अगस्त में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच मक्का में सामूहिक रक्षा समझौता हुआ था। दोनों समझौतों में तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। सवाल है कि इन नए गठजोड़ों का भारत और विश्व राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?