सर्बिया में 1 नवंबर 2024 को नोवी साद शहर के रेलवे स्टेशन के एक हिस्से के गिरने से 16 लोगों की मौत के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा था। लोगों ने, खासतौर से युवाओं ने इसे सरकारी निर्माण में भ्रष्टाचार का नतीजा बताया और सरकार से जवाबदेही की मांग की। छात्रों ने रेलवे स्टेशन हादसे से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने और दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। सरकार की अनदेखी और अड़ियल रवैये की वजह से आंदोलन धीरे-धीरे सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गया। इसमें विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ शिक्षक, प्रोफेशनल्स और दूसरे सामाजिक समूह भी शामिल हुए। वुचिच की सरकार ने आंदोलनकर्ताओं की मांग सुनने और वार्ता करने के बजाय आंदोलन को बदनाम करने और उसे कुचलने की कोशिश की। आंदोलन तो नहीं दब सका, उलटे इससे एक स्थानीय हादसे के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन बड़ा होता गया और देश भर में फैल गया।

राष्ट्रपति वुचिच ने छात्रों के आंदोलन पर विदेशी ताकतों द्वारा समर्थित होने का आरोप लगाया और भ्रष्टाचार के सवाल पर चुप्पी साधे रखी। आंदोलनकारी छात्रों ने मिलकर ‘स्टूडेंट लिस्ट’ के नाम से चुनावी समूह बनाया और इससे सर्बिया के प्रोफेशनल्स, पढ़े-लिखे लोगों को जोड़ा, जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा नाम था। यह एक गेम चेंजर साबित हुआ।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि छात्रों ने इसे केवल विश्वविद्यालयों और बड़े शहरों तक सीमित नहीं रखा। वे छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचे और भ्रष्टाचार तथा सरकारी जवाबदेही के सवाल को आम लोगों के जीवन से जोड़ा। उन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों के नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय अपने आंदोलन की स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। चुनावी मैदान में भी उन्होंने केवल छात्र नेताओं को आगे करने के बजाय शिक्षकों, डॉक्टरों, अर्थशास्त्रियों और दूसरे प्रतिष्ठित पेशेवरों को अपने साथ जोड़ा। इससे आंदोलन को व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता मिली और वह सरकार विरोधी प्रदर्शनों से आगे बढ़कर एक राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरा।

चुनावी नतीजों के बाद सर्बिया की संसद में स्टूडेंट लिस्ट से चुनकर बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित, डिग्रीधारक और पीएचडी युवा पहुंचे हैं। सर्बिया की संसद की 250 सीटों में से स्टूडेंट लिस्ट को 26 अक्टूबर तक घोषित प्रारंभिक नतीजों के अनुसार 140 सीटें मिली हैं और करीब 52.71 फीसदी वोट मिले हैं। राष्ट्रपति वुचिच ने अपनी राजनीतिक हार स्वीकार कर ली है। हालांकि संसदीय चुनाव में हार का मतलब राष्ट्रपति पद का तत्काल समाप्त होना नहीं है। नई सरकार के गठन और सत्ता हस्तांतरण की संवैधानिक प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी है।

सर्बिया में छात्रों की जीत, संसदीय चुनावों में जीत और अब सरकार बनाने तक का सफर निश्चित तौर पर यूरोप के बाकी देशों को प्रभावित कर सकता है। खासतौर से फ्रांस पर इसका गहरा असर पड़ सकता है, जहां पिछले कुछ समय से छात्र शिक्षा सुविधाओं में सुधार, बेहतर स्कूली शिक्षा व ढांचे के लिए आंदोलन कर रहे हैं। ग्रीस में महंगी शिक्षा और रहने के बढ़ते खर्च के खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरे हैं, जबकि बेल्जियम और इटली सहित दूसरे यूरोपीय देशों में भी शिक्षा के बजट, विश्वविद्यालयों की नीतियों और सामाजिक सवालों पर छात्र आंदोलन सक्रिय रहे हैं। ऐसे में सर्बिया की जीत इन आंदोलनों को एक नया राजनीतिक विश्वास दे सकती है। इसका असर बाल्कन क्षेत्र की राजनीति और सर्बिया के यूरोपीय संघ तथा रूस के साथ संबंधों पर भी पड़ सकता है। भारत के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि सर्बिया के साथ उसके पुराने मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और दोनों देश आर्थिक, तकनीकी तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। (संवाद)