संकट में पड़ी जैव प्रजातियों में से 47,677 प्रजातियों का अध्ययन किया गया जिनमें से 17,291 प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है। सभी ज्ञात स्तनधारियों में 21 प्रतिशत, सभी ज्ञात उभयचरों में 30 प्रतिशत, सभी ज्ञात पक्षियों में 12 प्रतिशत, सभी सरीसृपों में 28 प्रतिशत, मीठे पानी में रहने वाली मछलियों में 37 प्रतिशत, सभी पौधों में 70 प्रतिशत, और सभी अकशेरूकीय (इनवर्टिब्रेट) जीवों में 35 प्रतिशत का जीवन ही समाप्त होने के कगार पर है।
आई यू सी एन जैव विविधता संरक्षण समूह के निदेशक जेन स्मार्ट कहते हैं कि इनके विलुप्त होने के खतरे के बढ़ने के वैज्ञानिक सुबूत हैं ।
दुनिया के 5,490 स्तनधारियों में से 79 का अस्तित्व या तो समाप्त हो गया है या फिर वे अरण्य में विलुप्त हो रहे हैं। उनमें से 188 गंभीर संकट में हैं, 449 खतरे में हैं और 505 पर खतरा लगातार बढ़ रहा है।
लाल सूची में इस समय 1,677 सरीसृप हैं जिनमें से 293 इसी वर्ष जोड़े गये हैं। इनमें से 469 विलुप्त होने के कगार पर हैं और और 22 पहले से ही लुप्त हो गये हैं या अरण्य में लापता हो गये हैं।
जेन स्मार्ट का कहना है, `` हाल के विश्लेषणों से स्पष्ट है कि 2010 का जो लक्ष्य था इन ख़तरों को कम करने का वो पूरा नहीं हो पाएगा।’’
उनका कहना है कि सरकारों को फ़ौरन गंभीर कदम उठाने होंगे क्योंकि समय बेहद तेज़ी से ख़त्म हो रहा है।
इस संस्था की तरफ़ से जारी रेड लिस्ट दुनिया भर में फैले हज़ारों वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर बनती है और इसे जैव विविधता पर सबसे विश्वसनीय रिपोर्ट माना जाता है।
इस रिपोर्ट में मेढ़कों की प्रजातियों का ख़ास तौर पर ज़िक्र है और इसमें कहा गया है इसकी 6,285 प्रजातियों में से 1,895 विलुप्त होने की कगार पर हैं।
उदाहरण के तौर पर किहांसी स्प्रे टोड एक ऐसा मेढ़क है जो पहले ख़तरे में था और अब विलुप्त हो चुकी प्रजातियों की श्रेणी में आ गया है।
तनज़ानिया में पाया जानेवाला ये मेढ़क इसलिए लुप्त हुआ क्योंकि जहां इसका बसेरा होता था वहां नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध बना दिया गया और पानी के बहाव में 90 प्रतिशत की कमी आ गई।
जीव जगत
दुनिया के एक तिहाई जीवधारी नष्ट होने के कगार पर
कारगर कदम नहीं उठाया तो ये लुप्त हो जायेंगे
विशेष संवाददाता - 2009-11-03 12:40 UTC
आई यू सी एन की आज जारी लाल सूची 2009 के अनुसार इस संस्था द्वारा किए गये सर्वेक्षण में पता चला है कि दुनिया भर के जीवधारियों में से लगभग एक तिहाई के समक्ष अस्तित्व का गंभीर संकट है और यदि समुचित कदम नहीं उठाये गये तो ये शीघ्र ही विलुप्त हो जायेंगे।