भारत
सरकार के दो सत्ता केन्द्र पर बहस
मनमोहन को सोनिया का नेतृत्व क्यों स्वीकार करना पड़ा
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2014-04-19 09:28 UTC
इस बात पर बहस कि क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक कमजोर प्रधानमंत्री थे और सरकार के अंदर दो सत्ता केन्द्रों के अस्तित्व का होना एक सफल परीक्षण था या विफल अब एक बेमतलब की कसरत रह गई है। सच तो यह है कि 1998 में जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस पर कब्जा किया था, तो उसके बाद से वह लगातार कांग्रेस के अंदर सत्ता की एक अकेली केन्द्र थी। उनका नेतृत्व सिर्फ कांग्रेस द्वारा ही नहीं, बल्कि यूपीए के अंदर के कांग्रेस के सहयोगियों द्वारा भी स्वीकार कर लिया गया था। करुणानिधि को सोनिया गांधी के नेतृत्व से कोई परेशानी नहीं थी। एनसीपी का गठन किया तो गया था सोनिया गांधी का विरोध करते हुए, लेकिन जब यह यूपीए का हिस्सा बना तो इसके अध्यक्ष शरद पवार को सोनिया का नेतृत्व स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं हुई। लालू यादव भी बढ़चढ़कर सोनिया गांधी के नेतृत्व का समर्थन कर रहे थे।