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अभिव्यंजनावाद

अभिव्यंजनावाद साहित्य तथा कला में एक मत है जिसमें कहा जाता है कि कवि या कलाकार केवल अपने अंदर की भावना को प्रकट करता है न कि किसी बाह्य वस्तु को। यह भावना उसकी अपनी होती है। कलाकार का काम यथार्थ को यथावत चित्रित करना नहीं है। वह अपने अन्दर की भावना के आलोक में ही बाह्य वस्तुओं का चित्रण शब्दों या रंगों आदि के माध्यम से करता है। यह कैसे सम्पन्न होता है इसकी व्याख्या नहीं हो सकती।

यह अभिव्यंजनावाद बहुतों के लिए आदर्श है।

इतालवी दार्शनिक तथा विचारक बेनेदेतो क्रोचे (1866-1852) को इस मत का प्रणेता माना जाता है। उनका कहना था कि कला अन्दर की भावना या सहजज्ञान या इंट्यूशन का प्रकटीकरण नहीं बल्कि उसके अभिव्यंजित होने में है जिसका सम्बंध बाह्य जगत से नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि बाह्य वस्तु में वास्तविकता या यथार्थ नहीं है।

कुल मिलाकर, उनके अनुसार, भावों का अभिव्यंजन ही कला है। इसी मत को अभिव्यंजनावाद कहा गया।

इसी अभिव्यंजना के माध्यम से कलाकार या कवि आदि आनंद प्राप्त करते हैं तथा अपने आप से भी मुक्तिलाभ करते हैं।

Page last modified on Thursday January 9, 2014 11:35:15 GMT-0000