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औत्सुक्य

औत्सुक्य एक संचारी भाव है। सामान्य अर्थ में उत्सुकता का भाव ही औत्सुक्य है।

अग्निपुराण के अनुसार यह मन की वह अस्थिर अवस्था है जो इष्ट की प्राप्ति की इच्छा के कारण हो।

इष्ट की प्राप्ति में विलम्ब को सहन करने की क्षमता न होने के कारण औत्सुक्य उत्पन्न हो जाता है।

इस अवस्था का परिणाम सुखान्त भी हो सकता है और दुखान्त भी।


Page last modified on Sunday August 3, 2014 16:22:55 GMT-0000