कन्नड़
कन्नड, जिसे हिन्दी में कन्नड़ भी लिखा जाता है, दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य की एक भाषा है। यह कर्नाटक की राजभाषा है। यह भाषाओं की पंचद्राविड़ श्रेणी की पांच भाषाओं में से एक है। अन्य चार हैं - तमिल, तेलुगु, मलयालम तथा तुलु।वास्तव में तुलु भी कन्नड़ की ही पांच प्रमुख बोलियों में एक पुष्ट बोली है। अन्य चार प्रमुख बोलियां हैं - कोडगु, तोड, कोट तथा बडग।
कन्नड़ शब्द की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का कहना है कि कन्नड़ भाषा में नाडु का अर्थ होता है देश तथा करु का अर्थ होता है काली मिट्टी। इस प्रकार काली मिट्टी वाले देश को करुनाडु कहा गया जो बाद में कर्नाट और कर्नाटक बना। परन्तु अनेक विद्वान ऐसे भी हैं जो कन्नड को संस्कृत शब्द कर्णाट का देसज रूप मानते हैं। अन्य अनेक विद्वान कम्पितु और नाडु शब्द से इसकी व्युत्पत्ति बताते हैं जिसका अर्थ है सुगन्धों का देश। इससे बना कन्नाडु और उससे निकला कन्नाड। इस मत में सुगन्धित देश में जो भाषा बोली जाती है वह कन्नड कहलायी। यह आखिर सुगन्धित देश कैसे हुआ, इस प्रश्न के उत्तर में वे कहते हैं कि कर्नाटक में चंदन के पेड़ बहुतायत में मिलते हैं और चन्दन के सुगंध से यह सुगंधों का देश हो गया।
अंग्रेजी शासन में कर्नाटक से कर्नाटिक और फिर केनरा, केनरीज आदि नाम भी अंग्रेजी में लिखे जाने लगे। हिन्दी में कनारी, कन्नड, कन्नड़ और कनाडी भी प्रयोग में आये। कन्नडिगा कन्नड बोलने वालों को कहते हैं।
कन्नड और तेलुगु की लिपियां लगभग एक ही हैं। दोनों में नाममात्र का अन्तर ही कहा जायेगा। इसका विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि की दक्षिणी शाका से हुआ। यह देवनागरी से भी काफी मिलती जुलती है, परन्तु बनावट की दृष्टि से भिन्न दिखायी देती है। ध्वनि समूहों में अधिक अन्तर नहीं है।
कन्नड में स्वरों के अन्तर्गत ए तथा ओ के ह्रस्व रूप तथा व्यंजनों के अन्तर्गत वर्त्स्य ल के साथ-साथ मूर्धन्य ल वर्ण पाये जाते हैं। अन्य वर्ण देवनागरी के समान ही हैं।
तेरहवीं शताब्दी तक तेलुगु तथा कन्नड की लिपियां एक ही थीं, ऐसा विद्वानों का मत है।
कन्नड़ का इतिहास
कर्नाट तथा कर्नाटक शब्दों की तरह ही कन्नड शब्द भारत के अत्यन्त प्राचीन ग्रंथों में भी मिलते हैं तथा अनेक स्थानों पर उनका प्रयोग एक ही अर्थ में किया गया है। व्यास के महाभारत, वाराहमिहिर की वृहत्संहिता, सोमदेव के कथासरितसागर, गुणाढ्य की पैशाची बृहत्कथा आदि ग्रंथों में कर्नाट शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है।दूसरी शताब्दी के एक काव्य 'शिलप्पदिकार', जो तमिल भाषा में लिखी गयी है, में कन्नड भाषा बोलने वालों को करुनाडर कहा गया।
स्पष्ट है कि महाभारत तथा रामायण काल में भी कन्नड बोली जाती थी। परन्तु 450 ईस्वी के पूर्व का न तो इस भाषा का साहित्य उपलब्ध है और न ही शिलालेख। बेलूर के पास हल्मिडि गांव से जो कन्नड़ का शिलालेख मिला है वह 450 ईस्वी का ही है। यह गद्य में लिखा कन्नड़ का पहला शिलालेख है। पद्य में लिखे शिलालेख सातवीं शताब्दी में जाकर मिलते हैं। ये बीजापुर जिले के बादामी गांव तथा श्रवण-बेलागोल के शिलालेखों में मिलते हैं।
जहां तक कन्नड़ भाषा में लिखे गये ग्रंथों का सवाल है, ये नौवीं शताब्दी के बाद के ही मिलते हैं। इस प्रकार कन्नड़ का पहला ग्रंथ है कविराजमार्ग जिसका रचनाकाल 815 से 877 के बीच का निर्धारित किया गया है। इसके रचयिता कौन थे इसपर मतभेद बने हुए हैं।